Tuesday, April 15, 2025

सोशल मीडिया पर क्यों बढ़ रही है नफरत और कट्टरता

 

सोशल मीडिया पर क्यों बढ़ रही है नफरत और कट्टरता

आज हम सब सोशल मीडिया का खूब इस्तेमाल करते हैं। फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर, हर जगह हर दिन हजारों पोस्ट, वीडियो और राय हमारे सामने आती हैं। इंटरनेट का मकसद था कि लोग जुड़ें, विचार साझा करें और एक-दूसरे को समझें। लेकिन अब ये प्लेटफॉर्म कट्टर सोच और नफरत फैलाने का जरिया बनते जा रहे हैं।

अब लोग किसी की बात से असहमति होने पर उसे गालियाँ देने लगते हैं या ट्रोल करने लगते हैं। छोटे-छोटे मुद्दों को बड़ा बनाकर लड़ाई का माहौल बना दिया जाता है। कई बार बिना पूरी जानकारी के झूठी खबरें फैला दी जाती हैं, जिससे समाज में डर और गलतफहमी फैलती है। सोशल मीडिया का असर अब असली ज़िंदगी पर भी दिखने लगा है,  लोग कम मिलने लगे हैं, और ऑनलाइन की बहसें रिश्तों को भी बिगाड़ रही हैं। ऐसे में हमें सोचना होगा कि क्या हम सोशल मीडिया को सही तरीके से इस्तेमाल कर रहे हैं।

क्या कहता है सोशल मीडिया का सिस्टम?
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, खासकर Instagram, ऐसा कंटेंट आगे बढ़ाता है जो ज्यादा लोग देख रहे होते हैं। उसके पीछे एक एल्गोरिदम (कंप्यूटर सिस्टम) काम करता है जो उन्हीं पोस्ट्स को बार-बार दिखाता है जिन्हें ज्यादा लोगों ने पसंद किया हो या शेयर किया हो। अब होता क्या है, कोई कट्टर सोच या अजीब विचार अगर बार-बार लोगों तक पहुँचता है, तो लोग उसे आम सोच मानने लगते हैं। ये एक तरह की  गलतफहमी होती है, जिसे False Consensus Effect कहा जाता है। मतलब  एक छोटे से ग्रुप की राय, पूरे समाज की राय जैसी लगने लगती है।

लोगों में बीच की राय गायब हो गई है और इसका नतीजा ये होता है कि लोग दो हिस्सों में बंट जाते हैं, या तो पूरी तरह से उस सोच का समर्थन करते हैं, या फिर उसका पूरा विरोध। बीच में सोचने, समझने और सवाल करने वाले लोग कम हो जाते हैं सोशल मीडिया हमें मजबूर करता है कि हम किसी एक पक्ष में जाएँ  या तो हाँ कहें या ना। सोचने का मौका कम मिलता है। इसका एक अच्छा उद्हारण है, जब भारत में तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन शुरू हुआ, तब सोशल मीडिया पर इस विषय को लेकर ज़बरदस्त चर्चा होने लगी। Instagram, Twitter और Facebook जैसे प्लेटफॉर्म्स पर दोनों पक्षों  किसानों के समर्थन और विरोध  में कई पोस्ट्स वायरल होने लगे।

जो भी पोस्ट ज्यादा वायरल हुई, वही बार-बार लोगों को दिखाई देती रही। कुछ पोस्ट्स ने आंदोलन को देश विरोधी बताया, तो कुछ ने इसे पूरी तरह से सही ठहराया। ऐसे में सोशल मीडिया का एल्गोरिदम उस कंटेंट को ज़्यादा फैलाने लगा जो ज़्यादा लोगों को झटका दे या जो ज़्यादा चर्चा ला सके  चाहे वो पूरी सच्चाई हो या नहीं।

इसी दौर में एक बड़ा उदाहरण सामने आया , ग्रेटा थनबर्ग और “टूलकिट” का मामला। ग्रेटा ने किसानों के समर्थन में एक ट्वीट किया और एक डॉक्युमेंट  शेयर किया। उसके बाद सोशल मीडिया पर बवाल मच गया। कई लोगों ने बिना पूरी जानकारी के इसे देश के खिलाफ साजिश कह दिया। लोगों ने राय बनानी शुरू कर दी कुछ ने ग्रेटा को ही दुश्मन मान लिया, तो कुछ ने सरकार को। बीच की सोच, सवाल-जवाब, और गहराई से समझने की कोशिश कहीं खो सी  गई।

इस दौरान, सोशल मीडिया पर एक छोटी सोच, जैसे “जो किसान विरोध कर रहे हैं वो देशद्रोही हैं” या “जो सरकार का साथ दे रहे हैं वो किसानों के दुश्मन हैं”  इतनी बार दिखी कि लोगों को लगा यही आम सोच है। ब्लकी यही False Consensus Effect का उद्हारण है। कुछ लोगों की राय बार बार दिखने से वो सच और सामान्य लगने लगती है, जबकि हकीकत में बहुत सारे लोग तटस्थ थे या सोचने समझने में लगे थे

इसका नतीजा यह हुआ कि बहुत से लोग या तो पूरी तरह आंदोलन के साथ हो गए, या पूरी तरह सरकार के। बीच में सोचने, समझने और शांत होकर बात करने वालों की आवाज़ दबने लगी।

ऐसे में हम क्या करें:

ये घटना हमें सिखाती है कि सोशल मीडिया हमें सोचने की आज़ादी कम देता है और हमें एक तरफ झुकने पर मजबूर करता है। इसलिए ज़रूरी है कि हम हर वायरल चीज़ पर भरोसा करने से पहले खुद सोचें, सवाल करें और दोनों पक्षों को समझने की कोशिश करें।

सोशल मीडिया पर कुछ भी देखने या मानने से पहले खुद सोचिए, समझिए। किसी भी विचार को आँख बंद करके न अपनाएँ। हो सकता है जो चीज़ बहुत शेयर हो रही हो, वो सही ही हो, ऐसा जरूरी नहीं। समझदारी से फैसला लीजिए  यही एक जिम्मेदार डिजिटल नागरिक की पहचान है।

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home