डॉ. भीमराव अंबेडकर और जाति व्यवस्था: आज भी उतने ही ज़रूरी क्यों हैं?
डॉ. भीमराव अंबेडकर और जाति व्यवस्था: आज भी उतने ही ज़रूरी क्यों हैं?

डॉ. भीमराव अंबेडकर, जिन्हें हम प्यार से बाबासाहेब कहते हैं, सिर्फ संविधान निर्माता ही नहीं थे, बल्कि एक ऐसे समाज सुधारक थे जिन्होंने भारत की जाति व्यवस्था को बहुत गहराई से समझा और उस पर खुलकर सवाल उठाए। उनकी बातें आज भी हमें सोचने पर मजबूर करती हैं, क्या वाकई हमारे समाज से जाति खत्म हो गई है? या फिर उसका रूप बस बदल सा गया है? बाबासाहेब भी एक इंसान ही थे सीमाओं और गलतियों वाले। लेकिन उन्होंने उन सीमाओं को पार किया और एक महान चिंतक बने। उन्हें समझने और सम्मान देने का सही तरीका यही है कि हम उनकी बातों को आज के समाज की समस्याओं से जोड़ें और उनसे मार्गदर्शन लें।
डॉ. अंबेडकर का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जो समाज की सबसे निचली सीढ़ी पर था। लेकिन उन्होंने शिक्षा को अपना हथियार बनाया और दुनिया की सबसे ऊँची यूनिवर्सिटियों से डिग्रियाँ हासिल कीं। उन्होंने बताया कि अगर मौका और शिक्षा मिले तो कोई भी इंसान कुछ भी हासिल कर सकता है। उनका एक कथन था कि “राजनीति में व्यक्ति पूजा समाज को नुकसान पहुंचाती है।” यानी किसी भी नेता को भगवान बनाकर पूजना खतरनाक हो सकता है।
जाति आज भी क्यों ज़रूरी मुद्दा है:
आज भी भारत में जाति व्यवस्था पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। डॉ. अंबेडकर के समय जैसी थी, वैसी ही अब भी कई जगह देखने को मिलती है। हो सकता है कि अब जाति के आधार पर भेदभाव खुलकर कम होता हो, लेकिन हमें रोज़ खबरों में इसके कई उदाहरण मिलते हैं। आज भी निचली जातियों के लोगों को सिर्फ उनके जन्म की वजह से भेदभाव झेलना पड़ता है।
इसलिए डॉ. अंबेडकर को सबसे बड़ा जाति सुधारक माना जाता है। उनसे पहले महात्मा फुले, श्री नारायण गुरु और गांधी जी ने भी जाति के खिलाफ काम किया था, लेकिन डॉ. अंबेडकर की सोच सबसे अलग और गहरी थी। वे आज भी उतने ही ज़रूरी और प्रासंगिक हैं।
डॉ. अंबेडकर की जाति को लेकर सोच:
डॉ. अंबेडकर ने जाति को कभी भी सिर्फ एक इंसान की सोच या नैतिकता की समस्या नहीं माना, जैसा कि गांधी जी सोचते थे। उन्होंने अपनी किताब “Annihilation of Caste” (जाति का उन्मूलन) में साफ लिखा कि जाति और छुआछूत की जड़ें हमारे धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में छिपी हुई हैं। उनके अनुसार, लोग इसलिए जाति का पालन करते हैं क्योंकि वे धर्म को मानते हैं, न कि इसलिए कि वे बुरे या मूर्ख हैं।
डॉ. अंबेडकर का मानना था कि जब कोई बच्चा ऐसे माहौल में बड़ा होता है जहाँ जाति को सामान्य और सही माना जाता है, तो वह भी वैसे ही सोचने लगता है। वह जाति के आधार पर दूसरों को ऊँचा या नीचा समझने लगता है। यह सोच धीरे धीरे उसकी आदत बन जाती है। यही वजह है कि जातिवाद सिर्फ एक व्यक्ति की सोच नहीं, बल्कि पूरे समाज की बनायी हुई व्यवस्था है।
यह बात सिर्फ जाति तक ही सीमित नहीं है। डॉ. अंबेडकर ने समझाया कि यह हर उस भेदभाव पर लागू होती है जो जन्म के आधार पर होता है, जैसे औरतों को कमजोर समझना, या काले रंग के लोगों को नीचा मानना। जब समाज किसी समूह को बचपन से ही कमतर दिखाता है, तो फिर वह भेदभाव पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है।
इसलिए बाबासाहेब ने जाति को मिटाने के लिए सिर्फ कानून बदलने की बात नहीं की, बल्कि लोगों की सोच और धर्म की व्याख्या को भी बदलने पर ज़ोर दिया। उनका मानना था कि जब तक धर्म के नाम पर भेदभाव को सही ठहराया जाएगा, तब तक जातिवाद बनी रहेगी और ऐसे समाज में कभी सच्ची बराबरी नहीं आ सकती।
जाति को बनाए रखने वाली सोच और व्यवस्था
डॉ. अंबेडकर का मानना था कि जाति व्यवस्था सिर्फ पुराने समय की बात नहीं है, बल्कि यह आज भी हमारे समाज में इसलिए चल रही है क्योंकि समाज ने कुछ ऐसे नियम बना रखे हैं जो इसे ज़िंदा रखते हैं। इसे बनाए रखने में सबसे बड़ा कारण है अलग अलग जातियों के बीच शादी करने पर रोक लगाना और बच्चों को बचपन से ही जाति के फर्क सिखाना। जब किसी बच्चे को शुरू से यह बताया जाता है कि समाज में अच्छा समझे जाने के लिए जाति के नियमों को मानना जरूरी है, तो वह डरने लगता है कि अगर उसने जाति के बाहर शादी की, या किसी और जाति के लोगों के साथ घुल-मिलकर रहा, तो समाज उसे नकार देगा। यही डर लोगों को जाति के दायरे में ही रहने को मजबूर करता है।
डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि अस्पृश्यता की जड़ इस बात में है कि लोग अपनी ही जाति में शादी करें। जब जातियों के बीच शादी नहीं होती, तो लोग साथ खाना-पीना या घुलना-मिलना भी पसंद नहीं करते। यही भेदभाव की शुरुआत होती है।
जाति खत्म करने का रास्ता: शिक्षा और समाज में बदलाव
डॉ. अंबेडकर का मानना था कि जाति को खत्म करने के लिए न तो हिंसा जरूरी है और न ही ऊँची जातियों से नफरत करना। उनका रास्ता शांति, समझदारी और बदलाव का था। वे मानते थे कि जाति व्यवस्था को खत्म करने के लिए समाज में एक बड़ा बदलाव यानी सामाजिक क्रांति जरूरी है और वो मानते थे कि इस क्रांति की शुरुआत होती है शिक्षा से।
डॉ. अंबेडकर खुद एक ऐसी जाति से आते थे जिसमें उन्हें बहुत भेदभाव झेलना पड़ा था, लेकिन उन्होंने पढ़-लिखकर अपने हक के लिए आवाज़ उठाई और लाखों लोगों को जागरूक किया। उनके लिए शिक्षा ही सबसे बड़ा हथियार था। उनकी लड़ाई किसी एक जाति या व्यक्ति से नहीं थी, बल्कि उस पूरी व्यवस्था से थी जो लोगों को जन्म के आधार पर ऊँचा या नीचा समझती है। और इस व्यवस्था को तोड़ने का सबसे बड़ा और असरदार तरीका है, हर इंसान को अच्छी और बराबरी वाली शिक्षा देना, ताकि सभी को सोचने, समझने और आगे बढ़ने का बराबर मौका मिल सके


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