Tuesday, April 15, 2025

क्या डिजिटल इंडिया से बाहर हैं महिलाएं?

 

क्या डिजिटल इंडिया से बाहर हैं महिलाएं?

मोहल्ले के लोग बातें बनाते हैं “ लड़की हो फ़ोन क्या करोगी, भाई के फ़ोन से काम कर लो उसको ज्यादा जरुरत होती है।” “लड़की लोग को ज्यादा फोन वोन नहीं देते नहीं तो हाथ से निकल जायेगी।”  “ई लड़किया सब फोनवा को हमेशा हाथवा में  काहें लेके घुमती है,  ना जाने परसवा में रख लेगी तो कौन सा  खजनवा गिराए जाई।”

ऐसे वाक्य अक्सर घर, गली और नुकड़ों पर  सुनने को मिलते हैं। घर हो या बाहर, लड़कियों को फ़ोन और इंटरनेट से दूर रखने की मानसिकता आम है। समाज को तो शायद यहीं लगता है कि अगर वो महिलाओं को फोन और इंटरनेट से दूर रखेंगे तभी उनकी आधी से ज्यादा समस्याएं खत्म हो पायेंगी। लेकिन क्या यह सोच डिजिटल इंडिया के सपने को साकार करने में बाधा नहीं बन रही?

डिजिटल इंडिया का सपना और हकीकत:
भारत सरकार के डिजिटल इंडिया अभियान का उद्देश्य था “Power To Empower”, यानी हर नागरिक को डिजिटल माध्यम से सशक्त बनाना। इसके तहत ब्रॉडबैंड हाईवे, मोबाइल कनेक्टिविटी और सूचना तक सार्वभौमिक पहुंच जैसे स्तंभ शामिल हैं। लेकिन क्या यह पहल सही मायनों में सभी तक पहुंच रही है?, जवाब है नहीं जब कई ग्रामिण क्षेत्रों और गिरीब तबकों तक डिजीटल होने का जरिया ही उपलब्ध नहीं है तब कैसे डिजीटल होगा।

कहाँ है डिजिटल होने का जरिया
कॉलेज में पढ़ रहे हजारों बच्चे जिनके पास फीस के पैसे नहीं, वो स्मार्ट फ़ोन कैसे अफोर्ड कर सकते है। रूरल एरियाज में तो यह समस्या और बड़े स्तर पर है। जहां लाइट ही नहीं आती है 12 से 14 घंटे तो वहां के बच्चे अपने घर और कॉलेज के काम ऑनलाइन कैसे कर सकते हैं। ज्यादातर परिवारों में एक स्मार्ट फोन है या छोटा कीपैड फोन लेकिन सिर्फ़ खेत पर जाने वाले बाबा या शहर को आए पापा के पास और कहीं पर तो वह भी नहीं।

हमने कोविड के दौरान देखा है कि जब बच्चे ऑनलाइन मोड में एग्जाम दे रहे थे। नेटवर्क की समस्या के कारण उनके एग्जाम्स तो छूटे ही छूटे कई बच्चों का ईयर ड्रॉप भी हो गया। तब ये समस्या थी समझ आता है लेकिन अब क्या ये नहीं हो रहा है? हो रहा है बल्कि हालात बद से बद्तर हो गए है। जहां एक तरफ बच्चे वापस कॉलेज और क्लासेज की ओर रुख़ कर रहें है। कैंपस में आकर टाइम से क्लास करना चाहते है तो उन्हें उस टाइम पे क्लास ना मिलकर दोस्तों से पता चलता है। अरे! यार क्लास तो नहीं हैं सर ने व्हाटसप किया है 1 घंटे बाद लेंगे। तुम्हारे पास तो ये छोटा फ़ोन है इसमें कैसे चलाओगी और पीडीएफ भी तो पढ़ने होते हैं।

महिलाओं की डिजिटल भागीदारी:

डिजिटल इंडिया के सफर में महिलाओं की भागीदारी अभी भी सीमित है। आंकड़ों के अनुसार, महिलाओं के पास फोन या लैपटॉप की उपलब्धता पुरुषों के मुकाबले आधी भी नहीं है। अगर किसी लड़की को फोन मिलता भी है, तो उसकी प्राइवेसी पर सवाल उठाए जाते हैं। महिलाओं के लिए डिजिटल साधनों की कमी को समझना जरूरी है। आज के दौर में इंटरनेट शिक्षा, रोजगार, और विकास का अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन महिलाओं के पास इन संसाधनों की कमी है। यही वजह है कि डिजिटल इंडिया की पहल महिलाओं तक पूरी तरह से पहुंचने में विफल हो रही है। महिलाओं को अगर तकनीकी सशक्तिकरण की दिशा में कदम बढ़ाना है, तो उन्हें पहले डिजिटल साधनों की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी।

डिजिटल सशक्तिकरण के लिए ज़रूरी है कि सभी महिलाओं को समान अवसर दिया जाए। न केवल तकनीक की उपलब्धता सुनिश्चित हो, बल्कि समाज में यह सोच भी बदले कि महिलाएं भी डिजिटल दुनिया में बराबर की हिस्सेदारी निभा सकती हैं। भारत में डिजिटल इंडिया का सपना तभी साकार होगा जब महिलाएं भी पूरी तरह से इसका हिस्सा बनेंगी।

उर्दू के मश्हूर शायर’ कैफ़ी आज़मी’ ने तो 1995 में अपनी निजी सम्पत्ति से मिजवा गांव फूलपुर जिले में 10 कंप्युटर अपने ही कॉलेज में रखवाये जो मैट्रिक तक था और साथ ही जनरेटर भी लगवाया। जिससे लाइट जाने पर बच्चों को दिक्कत न हो। ऐसे ही यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लैपटॉप वितरण योजना शुरू की थी, जिससे छात्रों को इंटरनेट की सुविधा मिली। वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस दिशा में कदम उठाए हैं। लेकिन इन योजनाओं को और प्रभावी बनाने की जरूरत है।

विगत वर्षों के डाटा को देखा जाए तो महिलाओं के पास फोन या लैपटॉप उपलब्ध होने का जो अनुपात है वह पुरुषों के अनुपात का आधा भी नहीं है। इन्टरनेट तो हम तब पहुंचाएंगे जब उनके पास इंटरनेट कनेक्शन के लिए या डिजिटली अवेयर होने के सबसे न्यूनतम साधन के रुप में फोन भी उपलब्ध करवा पाएंगे। क्योंकि वह सिर्फ़ भाई, पापा, या पति के पास ही होगा और आप उसी मे अपनी डिजीटल दुनिया खोज ले यही बेहतर है । अगर कहीं फोन या लैपटाप मिल भी जाए तो इसकी हिस्ट्री और पासवर्ड घर में किसी बड़े (अब तो छोटो के पास भी) होना चाहिए ताकि लड़की कंट्रोल में रहे। डिजिटल इंडिया बनने के रास्ते में कुछ दूर का सफर तय कर चुके हैं पर डिजीटल के साथ साथ सोशल और पर्सनल लेवल पर भी सोसायटी को अवेयर कर पाए की आधी आबादी की हिस्सेदारी भी आज के डिजिटल दुनिया में उतनी ही ज़रूरी हैं जितनी और सबकी ।

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