मैं तुझे फिर मिलूँगी’, लेकिन इस बार तन्हाई नहीं बनकर
मैं तुझे फिर मिलूँगी’, लेकिन इस बार तन्हाई नहीं बनकर

“मैं तुझे फिर मिलूँगी , उस तन्हा लम्हे में, जब औरत अपने भीतर उतरती है, और सवाल करती है, ये तन्हाई मेरे हिस्से क्यों लिखी गई?”
औरत की ज़िंदगी में अगर कोई चीज़ सबसे ज़्यादा ठूसी गई है, तो वो है चुप्पी। समाज ने उससे हर मोड़ पर चुप रहने को कहा शादी में, मोहब्बत में, रिश्तों में, विरोध में… और जब उसने बोलना चाहा, तो उसे ‘बदतमीज़’, ‘बेबाक’, ‘तेज़’ कहकर चुप करवा दिया गया।
औरतें क्या चाहती हैं?
यह सवाल बहुत सीधा सा लगता है, लेकिन इसके पीछे सदियों की चुप्पी, दर्द और संघर्ष छिपा है। क्या औरतें बहुत कुछ माँग रही हैं? नहीं। वो बस चाहती हैं , इज़्ज़त, बराबरी, सच्चा प्यार, और सबसे ज़रूरी एक ऐसी ज़िंदगी जिसमें वो बिना डर के जी सकें, साँस ले सकें। ना कोई पीछा करने वाला हो, ना कोई ताना देने वाला, ना कोई शक करने वाला। बस एक सामान्य, सम्मानजनक जीवन।
लेकिन इतिहास गवाह है कि हर युग, हर सभ्यता और हर समाज ने औरत को उसकी आत्मा, उसकी सोच, उसके सपनों से नहीं पहचाना। औरत को हमेशा परखा गया, उसके शरीर से, उसके पहनावे से, उसके चलने-फिरने, हँसने-बोलने के तरीके से। उसे ‘कैसी औरत’ है, यह तय किया गया उसके व्यवहार से, संस्कार से, उसकी “मर्यादा” से, लेकिन कभी उसके विचारों से नहीं आज भी अगर कोई औरत सामने आती है चाहे वह पढ़ी-लिखी हो, आत्मनिर्भर हो, या आम जीवन जी रही हो तो समाज की पहली नज़र उसके कपड़ों पर पड़ती है, उसके चेहरे, उसके शरीर पर जाती है ना कि उसकी आँखों में छिपे सपनों पर, उसकी बातों में छुपे अनुभवों पर, या उसके विचारों की उड़ान पर।
समाज ने हमेशा औरत की आत्मा को अनदेखा किया है। उसे एक इंसान से पहले एक “स्त्री” के रूप में देखा गया है, और वो भी एक ऐसे चश्मे से जिसमें सिर्फ उसकी “शरीरिक छवि” को अहमियत दी जाती है।
आधी आबादी, अधूरी ज़िंदगी:
औरतें इस दुनिया की आधी आबादी हैं, पर क्या उन्हें आधे अधिकार भी हासिल हैं? क्यों आज भी एक स्त्री को बार-बार खुद को साबित करना पड़ता है, कि वह सोच सकती है, बना सकती है, चुन सकती है?
वर्जिनिया वुल्फ़ ने कहा था, “एक औरत को लेखिका बनने के लिए अपना कमरा चाहिए।” वह कमरा केवल दीवारों से नहीं, स्वतंत्रता से बनता है विचारों की, इच्छाओं की, अस्तित्व की। आज भी न जाने कितनी स्त्रियाँ उस कमरे की तलाश में भटक रही हैं।
महिलाओं ने जब भी किसी क्षेत्र में कुछ करने की कोशिश की है, तो उन्हें हमेशा रोका गया है। चाहे वह राजनीति हो, खेल हो, साहित्य हो या कोई और काम। यहाँ मैं एक मशहूर लेखिका जेन ऑस्टिन का उदाहरण देना चाहूंगी। जेन ऑस्टिन ब्रिटेन की रहने वाली थीं और बहुत ही प्रतिभाशाली लेखिका थीं। उनका पहला उपन्यास सेंस एंड सेंसिबिलिटी (Sense & Sensibility) था, जो 1811 में छपा। लेकिन इसे छपवाना आसान नहीं था। सिर्फ इसलिए कि जेन एक महिला थीं, उनका नाम किताब पर नहीं छापा गया। उसकी जगह लिखा गया, “Written by a Lady”। उनकी दूसरी किताब प्राइड एंड प्रेजूडिस (Pride & Prejudice) उन्होंने 1796-97 में लिखी थी, लेकिन यह 1813 में छप सकी। यानी करीब 16 साल बाद।
इन उदाहरणों से साफ़ होता है कि महिलाओं को अपनी पहचान बनाने के लिए कितनी मुश्किलों और रुकावटों का सामना करना पड़ा। सिर्फ इसलिए कि वे महिलाएं थीं।
अकेली औरत, समाज की सबसे बड़ी चुनौती:
जिस समाज ने स्त्री को देवी की संज्ञा दी,पूजा के योग्य माना, उसी समाज ने उसके पंख भी कतर दिए। उसे कहा गया, “तुम महान हो,” लेकिन साथ में ये भी तय कर दिया गया कि तुम्हारी महानता सीमाओं में बंद रहेगी।
स्त्री को आदर्श तब तक माना गया जब तक वो चुप रही, किसी की माँ, पत्नी, बहू या बेटी बनकर अपना अस्तित्व भूलती रही।लेकिन जैसे ही वह इन रिश्तों की परिभाषा से बाहर निकलती है,खासकर जब वह अकेली होती है,तो वह समाज की नजर में “संदिग्ध”, “असामान्य”, और यहाँ तक कि “खतरनाक“ बन जाती है।
एक अविवाहित स्त्री अगर अपनी शर्तों पर जी रही है, तो उससे पूछा जाता है,“शादी क्यों नहीं की?”, “कोई दिक्कत है क्या?”, या फिर सीधा सीधा मान लिया जाता है कि उसमें ही कोई कमी होगी। और अगर उसने विवाह तोड़ दिया, तो उसे तुरंत “कुलच्छिनी”, “घमंडी”, “अहंकारी”, या “संस्कारहीन” करार दे दिया जाता है। समाज उसे यह समझने का मौका ही नहीं देता कि उसने खुद को बचाने के लिए रिश्ता छोड़ा हो सकता है, ना कि तोड़ने के लिए।
क्यों डरता है समाज एक अकेली औरत से?
क्योंकि वह किसी की “परिभाषा” में नहीं आती। उसे कंट्रोल नहीं किया जा सकता। वह अपने फैसले खुद लेती है, किसी से अनुमति नहीं मांगती, किसी की छाया में जीने से इनकार करती है। ऐसी औरत समाज के बनाए हर नियम को चुनौती देती है, कि औरत को हमेशा किसी के साथ होना चाहिए, किसी के अधीन होना चाहिए। एक अकेली औरत वह आईना बन जाती है जिसमें समाज अपने पूर्वाग्रह, भय, और पाखंड को साफ-साफ देख सकता है, और यही उसे असहज कर देता है।
जब औरत कलम उठाती है:
तसलीमा नसरीन, इस्मत चुगताई, अमृता प्रीतम, ये वे नाम हैं जिन्होंने अपने शब्दों से पितृसत्ता की नींव हिला दी। इन्होंने चुप्पी तोड़ी, सवाल किए, अपने अनुभवों को बिना संकोच बाँटा। और नतीजा? समाज ने उन्हें बदचलन, बाग़ी और बेहया कहकर नकारा। पर क्या सच्चाई कहना गुनाह है?
तस्लीमा नसरीन एक बहादुर बांग्लादेशी लेखिका थीं। उन्हें बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ा, क्योंकि उनके विचारों की वजह से उन्हें उनके ही देश से बाहर निकाल दिया गया। उनकी किताबों को छापने की इजाजत नहीं दी जाती थी।
तस्लीमा नसरीन ने एक बार कहा था, “औरतों का कोई अपना देश नहीं होता।” यह बात उन्होंने पितृसत्ता के खिलाफ अपनी किताब में लिखी थी। उन्होंने इस किताब में महिलाओं के हक़ में खुलकर लिखा और उनकी समस्याओं को सामने रखा।
इस किताब के एक लेख का नाम है, “पुरुषों को मिलते हैं अधिकार, औरतों पर होती है जिम्मेदारियाँ।” इसमें तस्लीमा लिखती हैं “सदियों तक लोगों को यह समझ ही नहीं आया कि एक औरत, माँ होने के साथ-साथ एक इंसान भी होती है। हमेशा औरत को एक छोटी और कमज़ोर इंसान के तौर पर देखा गया, उसे कभी बराबरी का दर्जा नहीं दिया गया।”
तस्लीमा यह भी कहती हैं कि औरतें सिर्फ भारत में नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। अपनी एक और रचना “लेट गल्स बी बॉयज़” में वो कहती हैं, “यह दुनिया मर्दों की है। इस दुनिया में कोई और चीज़, कोई भी प्राणी औरत जितना असुरक्षित नहीं है।”
21वीं सदी की विडंबना:
जब एक लड़की आत्मविश्वास के साथ अपनी राय रखती है, अपने मन की बात कहती है, अपनी पसंद नापसंद जाहिर करती है, तो समाज उसे “अटेंशन सीकर” करार देता है। उसे ऐसा दिखाने की कोशिश की जाती है जैसे वह बस सबका ध्यान खींचने के लिए ये सब कर रही हो, न कि अपने वजूद को जीने के लिए।
लेकिन जब वही लड़की चुप रहना पसंद करे, अपनी बातों को अंदर ही अंदर घुटने दे, तो समाज उस पर “कमज़ोर”, “दबी-कुचली”, “असभ्य” जैसे तमगे लगा देता है। यानी किसी भी हालत में दोष उसी का है, बोलो तो भी गुनहगार, चुप रहो तो भी।यहाँ सवाल सिर्फ़ उसके व्यवहार का नहीं, बल्कि उस सोच का है जो हर महिला को किसी न किसी खांचे में बाँधकर देखना चाहता है।
ये दौर स्मार्टफोन और सोशल मीडिया का है, जहाँ ‘फेमिनिज़्म’ जैसे शब्द ट्रेंड करते हैं, जहाँ महिला सशक्तिकरण की बातें मंचों और घोषणाओं पर खूब होती हैं। पर सच्चाई यह है कि यह सब कहीं न कहीं “आधुनिकता का मुखौटा” है, जो बस चेहरे पर चढ़ा लिया गया है। जैसे ही कोई औरत खुलकर हँसती है, उसे ‘बेशर्म’ कहा जाता है। उसके कपड़ों से लेकर उसके हाव भाव तक पर सवाल उठाए जाते हैं।
और जब वही औरत रोती है, किसी दर्द से, किसी पीड़ा से तो उसे या तो ड्रामा करार दिया जाता है, या कहा जाता है, “इतनी ही कमज़ोर है तो बाहर क्यों निकली?” यानी न उसकी ख़ुशी स्वीकार है, न उसका ग़म।
औरत को समाज से चाहिए क्या?
उसे दया नहीं चाहिए, क्योंकि दया तो कमज़ोरों पर की जाती है। और औरत कोई बेबस या निरीह प्राणी नहीं है। उसे किसी की करुणा की नहीं, बराबरी की ज़रूरत है।
बराबरी, जो उसकी काबिलियत, सोच और हक़ को उसी तरह मान्यता दे, जैसे किसी पुरुष को दी जाती है। औरत को बराबर की जगह चाहिए घर में, समाज में, और हर उस जगह जहाँ फ़ैसले लिए जाते हैं।
समाज अक्सर कहता है, “हम औरतों की सुरक्षा करना चाहते हैं।” लेकिन यह सुरक्षा एक सीमित दायरे की तरह पेश की जाती है, जहाँ औरत को आज़ादी नहीं बल्कि निगरानी दी जाती है। हर समय यह कहा जाता है कि “तुम बाहर मत जाओ”, “ऐसे कपड़े मत पहनो”, “रात को मत निकलो” यह कैसी सुरक्षा है जिसमें साँस लेने की भी इजाज़त नहीं?
औरत को सुरक्षा के नाम पर बनाई गई चारदीवारी नहीं चाहिए, उसे खुले आसमान में उड़ने की आज़ादी चाहिए। वह खुद तय करना चाहती है कि कहाँ जाना है, कैसे जीना है, क्या पहनना है। वह सुरक्षा नहीं, वो हक़ मांगती है जो उसका जन्मसिद्ध अधिकार है।
औरत को अक्सर नाज़ुक कहकर एक सजावटी फूल की तरह पेश किया जाता है, जिसे टूटने से बचाना है, छूने से पहले इजाज़त लेनी है, और हरदम एक काँच के गुलदस्ते में रख देना है। लेकिन असल में वह फूल नहीं, एक ज्वाला है। एक ऐसी आग, जो ज्ञान भी दे सकती है, और अन्याय के ख़िलाफ़ जल भी सकती है। एक ऐसी ताक़त, जो परिवार को भी संवारती है, और ज़रूरत पड़ने पर समाज को भी आईना दिखा सकती है


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