Tuesday, March 4, 2025

रोहतास गढ़ : बिहार का भूला-बिसरा स्वर्णिम इतिहास



बिहार की धरती अपने भीतर अनगिनत कहानियाँ समेटे हुए है। इनमें से एक अनमोल विरासत है रोहतास गढ़ क़िला। कैमूर की पहाड़ियों पर बसा यह क़िला इतिहास, वास्तुकला और वीरता का अनोखा संगम है। आज भले ही यह क़िला खंडहरों में बदल गया है, लेकिन इसकी दीवारें आज भी सदियों पुरानी कहानियाँ फुसफुसाती हैं।

प्राकृतिक सुरक्षा और शिल्प का अद्भुत मेल:

करीब 1500 फीट की ऊँचाई पर बना यह क़िला चारों ओर से खाई और घने जंगलों से घिरा है, जिससे दुश्मनों के लिए इसमें घुस पाना बहुत कठिन था। यह न सिर्फ़ एक सैनिक क़िला था, बल्कि इसमें एक पूरा शहर बसाया गया था – जिसमें मंदिर, महल, कुंए, बावड़ियाँ और सैनिकों के रहने के स्थान शामिल थे।

शेरशाह सूरी और रोहतास :

16वीं शताब्दी में इस क़िले को शेरशाह सूरी ने और भी मज़बूत बनवाया। उन्होंने यहाँ हिंदू और अफ़ग़ानी शिल्पशैली को मिलाकर कई सुंदर इमारतें बनवायीं। सबसे प्रसिद्ध इमारतों में रानी का महल, जामा मस्जिद, और हथीया पोखरा शामिल हैं।

स्वतंत्रता संग्राम में योगदान:

1857 की क्रांति के समय यह क़िला स्वतंत्रता सेनानियों की शरणस्थली बना। अंग्रेजों से छिपते हुए कई सेनानियों ने यहीं से अपने अभियान चलाए। अंग्रेजों ने इस क़िले को नष्ट करने की कोशिश की, लेकिन इसकी चट्टानों जैसी दीवारों ने सब सह लिया।

बिलकुल! नीचे दिए गए पैराग्राफ़ को मैंने सरल और आसान शब्दों में दोबारा लिखा है, ताकि इसे समझना और पढ़ना और भी सहज हो:

दिसंबर 2011: रोहतास गढ़ के लिए एक ऐतिहासिक महीना

दिसंबर 2011 का महीना रोहतास गढ़ क़िले के लिए बहुत खास रहा। इसी महीने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस क़िले का दौरा किया और इसके विकास के लिए कई योजनाओं की घोषणा की। यह पहली बार था जब किसी मुख्यमंत्री ने कैमूर के इस दूर-दराज़ इलाके में आकर क़िले का भ्रमण किया। उनका यह दौरा एक नई उम्मीद लेकर आया और यह साबित कर दिया कि रोहतास गढ़ में अब बदलाव की शुरुआत हो चुकी है।


रोहतास गढ़ का पर्यटन आकर्षण:

ऊँचे पहाड़ों, गहरी घाटियों, घने जंगलों, झीलों, झरनों और नदियों से घिरा हुआ रोहतास गढ़ क़िला अपने प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। यहाँ आने वाले पर्यटक इसकी शांत और हरी-भरी वादियों में खो जाते हैं। यह जगह प्राकृतिक दृश्यों से भरपूर है, जो हर किसी का मन मोह लेती है।


रोहतास गढ़ की ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक धरोहरें:

प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ रोहतास गढ़ में कई ऐसे ऐतिहासिक और पुरानी धरोहरें हैं, जो आज भी बहुत खास हैं। ये जगहें कई सौ सालों से समय की मार झेलती आ रही हैं, लेकिन आज भी अपनी पहचान बनाए हुए हैं। आइए जानते हैं कुछ प्रमुख धरोहरों के बारे में:

1. हथिया पोल  
यह क़िले का मुख्य और सबसे बड़ा दरवाज़ा है, जिसका निर्माण सन 1597 में हुआ था। इस दरवाज़े पर सुंदर हाथियों की मूर्तियाँ बनी हैं, इसी वजह से इसे "हथिया पोल" कहा जाता है।

2. आईना महल  
यह एक सुंदर और भव्य महल है जिसे राजा मानसिंह ने अपनी पत्नी के लिए बनवाया था। इसका नाम ही बताता है कि यह कभी बहुत चमकदार और सुंदर रहा होगा।

3. तख़्त-ए-बादशाही  
यह क़िले की सबसे बड़ी इमारत है, जिसे राजा मानसिंह ने खुद के रहने के लिए बनवाया था। यह चार मंज़िला है, जिसमें गुंबद और नक्काशीदार खंभे हैं। इसकी छत से पूरे इलाके का नज़ारा दिखता है।

4. बारादरी  
यह इमारत राजा मानसिंह के रहने की जगह का हिस्सा थी और जनाना (महिलाओं का हिस्सा) से जुड़ी थी। इसके पास ही दीवाने-ख़ास था, जिसे सुंदर फूल-पत्तियों की नक्काशी से सजाया गया है।

5. जामी मस्जिद, हब्श खां की दरगाह और सूफ़ी सुल्तान का मक़बरा
शेरशाह सूरी के समय में, 1543 में बनी यह मस्जिद सफेद बलुआ पत्थर से बनी है और इसमें तीन गुंबद हैं। इसके आस-पास बनी अन्य इमारतें राजपूताना शैली की छतरी जैसी हैं और देखने में बहुत सुंदर हैं।

6. गणेश मंदिर  
यह मंदिर राजा मानसिंह के महल से लगभग आधा किलोमीटर दूर है। इसका निर्माण 17वीं सदी में चित्तौड़ के मीराबाई मंदिर की शैली में हुआ था। इसके गर्भगृह (मुख्य भाग) के आगे दो सुंदर द्वार-मंडप हैं।

7. फांसी घर  
क़िले के पश्चिम की ओर एक पुरानी इमारत है, जिसे लोग फांसी घर कहते हैं। इसके पास ही करीब 1500 फीट गहरी खाई है। यहीं एक फ़क़ीर की मज़ार है जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्हें तीन बार खाई में फेंका गया, लेकिन वे हर बार सुरक्षित बच गए।

8. रोहतासन या चौरासन मंदिर 
यह मंदिर क़िले से लगभग डेढ़ किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित है। यह भगवान शिव का मंदिर है। इसकी छत को पुराने समय में तोड़ दिया गया था। अब यहां तक पहुँचने के लिए 84 सीढ़ियाँ बची हैं, इसी वजह से इसे "चौरासन मंदिर" भी कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यह मंदिर राजा हरिश्चंद्र के समय का है। पास में एक देवी का प्राचीन और सुंदर मंदिर भी है।


वर्तमान में उपेक्षा का शिकार :

इतिहास के इतने गौरवशाली पन्नों को समेटे हुए यह क़िला आज वीरान पड़ा है। न सरकार की खास निगरानी है और न ही स्थानीय प्रशासन की। पर्यटक आते हैं, पर जानकारी और सुविधाओं की भारी कमी महसूस होती है।


रोहतास गढ़ सिर्फ़ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, यह बिहार के गौरव का प्रतीक है। ज़रूरत है कि हम इसके इतिहास को न सिर्फ़ किताबों में, बल्कि अपनी चेतना में भी ज़िंदा रखें। इस धरोहर को संजोना हम सबकी जिम्मेदारी है।

रोहतासगढ़ किले की यात्रा जानकारी
अगर आप इस ऐतिहासिक किले की यात्रा करना चाहते हैं, तो इसका सबसे अच्छा समय अक्टूबर से फरवरी के बीच का होता है। गर्मियों में यहां चढ़ाई करना कठिन हो सकता है, जबकि बारिश के मौसम में पहाड़ी रास्ते फिसलन भरे हो सकते हैं।

इस किले तक पहुंचने के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन सासाराम (लगभग 45 किमी) है, जबकि निकटतम हवाई अड्डा पटना (लगभग 150 किमी) में स्थित है। सासाराम और डेहरी-ऑन-सोन से टैक्सी या बस द्वारा इस किले तक पहुंचा जा सकता है।

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