हमें गरीब बनाया था तो माहवारी नहीं देनी चाहिए थी
हमें गरीब बनाया था तो माहवारी नहीं देनी चाहिए थी

महिलाओं में माहवारी एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसे अक्सर एक अनिवार्य और अभिन्न शारीरिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है। लेकिन जब यह प्रक्रिया गरीबी और संसाधनों की कमी से घिरी महिलाओं और किशोरियों के जीवन को चुनौतीपूर्ण बना देती है, तो यह समाज के लिए सोचने का विषय बन जाता है।
भारत जैसे विकासशील देशों में जहां गरीबी एक व्यापक समस्या है, वहां माहवारी एक और संघर्ष के रूप में सामने आती है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं के पास स्वच्छता संबंधी उत्पादों जैसे सैनिटरी पैड्स की न तो जानकारी होती है और न ही पहुंच। इसके बदले में वे अस्वच्छ वस्त्र या प्राकृतिक चीजों का सहारा लेती हैं, जो स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। शहरी क्षेत्रों में भी रहने वाली गरीब महिलाएं जो झोपड़ पट्टी और फ्लाईओवर के निचे अपना गुजर बसर करती है माहवारी के वक्त उन्हें कई चुनौतीयों का सामना करना पड़ता है।
सासाराम फ्लाईओवर के निचे रह रही महिलाओं से जब माहवारी पर बात की गई तो उन्होंने बताया ऐसे दिनों में वो राख, बालू और कपड़ा जैसे चीजों का इस्तेमाल करती हैं। कभी- कभी तो हालात ऐसे होते है कि ऐसे दिनों में इस्तेमाल करने के लिए उनके पास कपड़े तक नहीं होते वो एक ही कपड़े को धोकर कई दिनों तक इस्तेमाल करती है। इससे महिलाओं के स्वास्थय पर बहोत बुरा प्रभाव पड़ता है। जब हमने इन महिलाओं से कहा कि अभी सेनेटरी पैड तो बहोत सस्ती हो गई है इस पर उन्होनें कहा कि एक गरीब को दो वक्त की रोटी के आगे कहा कुछ दिखता है, पैड कितनी भी सस्ती हो जाये हमें तो उससे पहले दो वक्त का खाना दिखता है।
सामाजिक और आर्थिक बाधाएं
गरीब परिवारों में अक्सर महिलाओं और किशोरियों की जरूरतों को अनदेखा कर दिया जाता है। माहवारी के दौरान उचित स्वच्छता उत्पाद खरीदने के लिए पैसे खर्च करना “अवश्यक” नहीं समझा जाता। यही कारण है कि कई किशोरियां माहवारी के समय स्कूल जाना छोड़ देती हैं, और यह उनके शिक्षा स्तर और आत्मविश्वास पर गहरा प्रभाव डालता है। माहवारी को आज भी एक वर्जित विषय के रूप में देखा जाता है। इसे गंदा या अपवित्र मानने की मानसिकता ने इसे गरीबी से ग्रस्त महिलाओं के लिए और भी कठिन बना दिया है। जब समाज में खुलकर इस पर चर्चा नहीं होती, तो यह समस्याएं और बढ़ जाती हैं।
समाज की मानसिकता:
अगर ऐसी महिला जिसे मधुमक्खी ने काट लिया हो और वह मंदिर में जाना चाहती है, तो वहां मौजूद पुरुष उन्हें डांटकर वहां से भगा देते हैं। जहां अंधविश्वास की जड़ें इतनी मज़बूती से फैली हैं, वहां पढ़े-लिखे लोग भी माहवारी को अभिशाप और माहवारी के समय महिलाओं को अपवित्र मानते हैं।
कैसे बदल सकती है तस्वीर:
कुछ साल पहले एक महिला ने सोशल मीडिया के ज़रिये बताया कि एक बार उसने अपने घर की मेड को साफ-सफाई के लिए एक पुराना टी शर्ट दिया। उसे देखकर वह बोली, “मेम साहब क्या यह टीशर्ट मैं रख लूं?” इसपर महिला ने कहा कि तू क्या करेगी इसका, तू तो साड़ी पहनती है।
इसपर उसने जवाब देते हुए कहा कि मैं इस कपड़े का इस्तेमाल उन दिनों के लिए करूंगी क्योंकि मेरा कपड़ा अब बार-बार धुलने से पूरी तरह से फट चुका है। उसकी बात सुनकर महिला सन्न रह गई। महिला ने उसे सैनिटरी पैड के इस्तेमाल की सलाह दी और हर महीने पैड देने का वादा भी किया।
अगर हम अपने आस-पास रहने वाली गरीब महिलाओं जैसे घर में बर्तन मांजने वाली, मज़दूरी करने वाली और सब्ज़ी आदि बेचने वाली इन महिलाओं को माहवारी के समय स्वच्छता के प्रति गंभीर रहने की सलाह देने के साथ-साथ उन्हें मासिक सैलरी के साथ सेनेटरी पैड भी दे सकें तो हालात बदल सकते हैं।
वहीं, स्कूलों में ऐसे कार्यक्रम चलाए जाएं जो बच्चियों की माहवारी की समस्याओं को सुलझा सकें। उन्हें इस दौरान साफ-सफाई के मायने समझाए जाएं ताकि कम-से-कम वह माहवारी के डर से स्कूल जाना बंद ना करें।


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