Tuesday, March 11, 2025

हमें गरीब बनाया था तो माहवारी नहीं देनी चाहिए थी

हमें गरीब बनाया था तो माहवारी नहीं देनी चाहिए थी

महिलाओं में माहवारी एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसे अक्सर एक अनिवार्य और अभिन्न शारीरिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है। लेकिन जब यह प्रक्रिया गरीबी और संसाधनों की कमी से घिरी महिलाओं और किशोरियों के जीवन को चुनौतीपूर्ण बना देती है, तो यह समाज के लिए सोचने का विषय बन जाता है।

भारत जैसे विकासशील देशों में जहां गरीबी एक व्यापक समस्या है, वहां माहवारी एक और संघर्ष के रूप में सामने आती है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं के पास स्वच्छता संबंधी उत्पादों जैसे सैनिटरी पैड्स की न तो जानकारी होती है और न ही पहुंच। इसके बदले में वे अस्वच्छ वस्त्र या प्राकृतिक चीजों का सहारा लेती हैं, जो स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है।  शहरी क्षेत्रों में भी रहने वाली गरीब महिलाएं जो झोपड़ पट्टी और फ्लाईओवर के निचे अपना गुजर बसर करती है माहवारी के वक्त उन्हें कई चुनौतीयों का सामना करना पड़ता है।

सासाराम फ्लाईओवर के निचे रह रही महिलाओं से जब माहवारी पर बात की गई तो उन्होंने बताया ऐसे दिनों में वो राख, बालू और कपड़ा जैसे चीजों का इस्तेमाल करती हैं। कभी- कभी तो हालात ऐसे होते है कि ऐसे दिनों में इस्तेमाल करने के लिए उनके पास कपड़े तक नहीं होते वो एक ही कपड़े को धोकर कई दिनों तक इस्तेमाल करती है। इससे  महिलाओं के स्वास्थय  पर बहोत बुरा प्रभाव पड़ता है। जब हमने इन महिलाओं से कहा कि अभी सेनेटरी पैड तो बहोत सस्ती हो गई है इस पर उन्होनें कहा कि एक गरीब को दो वक्त की रोटी के आगे कहा कुछ दिखता है, पैड कितनी भी सस्ती हो जाये हमें तो उससे पहले दो वक्त का खाना दिखता है।

सामाजिक और आर्थिक बाधाएं
गरीब परिवारों में अक्सर महिलाओं और किशोरियों की जरूरतों को अनदेखा कर दिया जाता है। माहवारी के दौरान उचित स्वच्छता उत्पाद खरीदने के लिए पैसे खर्च करना “अवश्यक” नहीं समझा जाता। यही कारण है कि कई किशोरियां माहवारी के समय स्कूल जाना छोड़ देती हैं, और यह उनके शिक्षा स्तर और आत्मविश्वास पर गहरा प्रभाव डालता है। माहवारी को आज भी एक वर्जित विषय के रूप में देखा जाता है। इसे गंदा या अपवित्र मानने की मानसिकता ने इसे गरीबी से ग्रस्त महिलाओं के लिए और भी कठिन बना दिया है। जब समाज में खुलकर इस पर चर्चा नहीं होती, तो यह समस्याएं और बढ़ जाती हैं।

समाज की मानसिकता:

अगर ऐसी महिला जिसे मधुमक्खी ने काट लिया हो और वह मंदिर में जाना चाहती है, तो वहां मौजूद पुरुष उन्हें डांटकर वहां से भगा देते हैं। जहां अंधविश्वास की जड़ें इतनी मज़बूती से फैली हैं, वहां पढ़े-लिखे लोग भी माहवारी को अभिशाप और माहवारी के समय महिलाओं को अपवित्र मानते हैं।

कैसे बदल सकती है तस्वीर:
कुछ साल पहले एक महिला ने सोशल मीडिया के ज़रिये बताया कि एक बार उसने अपने घर की मेड को साफ-सफाई के लिए एक पुराना टी शर्ट दिया। उसे देखकर वह बोली, “मेम साहब क्या यह टीशर्ट मैं रख लूं?” इसपर महिला ने कहा कि तू क्या करेगी इसका, तू तो साड़ी पहनती है।

इसपर उसने जवाब देते हुए कहा कि मैं इस कपड़े का इस्तेमाल उन दिनों के लिए करूंगी क्योंकि मेरा कपड़ा अब बार-बार धुलने से पूरी तरह से फट चुका है। उसकी बात सुनकर महिला सन्न रह गई। महिला ने उसे सैनिटरी पैड के इस्तेमाल की सलाह दी और हर महीने पैड देने का वादा भी किया।

अगर हम अपने आस-पास रहने वाली गरीब महिलाओं जैसे घर में बर्तन मांजने वाली, मज़दूरी करने वाली और सब्ज़ी आदि बेचने वाली इन महिलाओं को माहवारी के समय स्वच्छता के प्रति गंभीर रहने की सलाह देने के साथ-साथ उन्हें मासिक सैलरी के साथ सेनेटरी पैड भी दे सकें तो हालात बदल सकते हैं।

वहीं, स्कूलों में ऐसे कार्यक्रम चलाए जाएं जो बच्चियों की माहवारी की समस्याओं को सुलझा सकें। उन्हें इस दौरान साफ-सफाई के मायने समझाए जाएं ताकि कम-से-कम वह माहवारी के डर से स्कूल जाना बंद ना करें।

Monday, March 10, 2025

न्याय की डगर पर क्यों अकेली है औरत? जब अदालतें भी पीड़िता से सवाल करती हैं…

 

न्याय की डगर पर क्यों अकेली है औरत? जब अदालतें भी पीड़िता से सवाल करती हैं…

जब किसी महिला के साथ बलात्कार जैसी भयावह और अमानवीय घटना होती है, तो वह सबसे पहले इस उम्मीद में आगे आती है कि उसे न्याय मिलेगा। वह सोचती है कि क़ानून उसके साथ खड़ा होगा, समाज उसका समर्थन करेगा, और अपराधी को सज़ा मिलेगी। लेकिन अफ़सोस की बात है कि असल ज़िंदगी में उसका सामना अक्सर दूसरी ही तरह की “परीक्षा” से होता है,  एक ऐसी परीक्षा जिसमें उसे बार-बार अपने ही दर्द को साबित करना पड़ता है। बलात्कार पीड़िता अदालत पहुंचती है, तो वहां उससे कुछ ऐसे सवाल पूछे जाते हैं जो उसके घावों पर मरहम नहीं, नमक का काम करते हैं:

  • “उसने चिल्लाया क्यों नहीं?”

  • “उसने ऐसे कपड़े क्यों पहने?”

  • “उसने विरोध क्यों नहीं किया?”

ये सवाल सोशल मीडिया पर किये जाने वाले ट्रोल नहीं, बल्कि अदालतों में बैठे जजों और वकीलों द्वारा पूछे जाते हैं, वही लोग जो न्याय की कुर्सी पर आसीन हैं, जिनसे समाज को सबसे ज्यादा उम्मीद होती है।

क्या कभी किसी से पूछा गया कि जब उसके घर में चोरी हुई तो उसने चोर को पकड़ने की कोशिश क्यों नहीं की? क्या कभी किसी को यह बताने को मजबूर किया गया कि जब उसके साथ सड़क पर लूट हुई, तो उसने लुटेरे से भिड़ने की हिम्मत क्यों नहीं दिखाई? फिर बलात्कार जैसी घटना के शिकार व्यक्ति से ही ऐसे असंवेदनशील सवाल क्यों?

सच्चाई यह है कि बलात्कार सिर्फ एक शारीरिक हिंसा नहीं है, बल्कि यह मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक हमला है। यह पीड़िता की आत्मा पर ऐसा ज़ख्म छोड़ता है, जिसे भरने में पूरी ज़िंदगी लग सकती है। और जब उसी पीड़िता से अदालत में बार बार वही दर्द दोहराया जाता है, जब उसे अपनी गरिमा, अपनी आवाज, और अपने ही शरीर के बारे में सफाई देनी पड़ती है, तो वह न्याय प्रक्रिया एक और तरह का उत्पीड़न बन जाती है।

औरत से पूछा जाता है कि उसने क्या पहना था? लेकिन यह कोई नहीं पूछता कि उस बलात्कारी ने क्या सोचा था? उसकी सोच को, उसकी मानसिकता को, और उसके अपराध को कटघरे में खड़ा करने की जगह, हम बार बार पीड़िता की नीयत, नियति और निर्णय पर सवाल उठाते हैं। समस्या सिर्फ कानून की नहीं, समाज की मानसिकता की भी है। जहाँ एक महिला की चुप्पी को उसकी सहमति मान लिया जाता है, जहाँ ‘ना’ को चुनौती और ‘हां’ को आमंत्रण समझा जाता है, वहाँ हर बलात्कार के बाद सबसे पहले पीड़िता को ही दोषी ठहराया जाता है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला और विवाद:

लेकिन इस समस्या की गंभीरता सिर्फ सवालों तक सीमित नहीं है। कभी-कभी न्यायालयों के फैसले भी समाज में ग़लत संदेश दे जाते हैं, ऐसा ही एक ताज़ा उदाहरण मार्च 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक विवादास्पद फैसले में सामने आया। इस फैसले में अदालत ने कहा कि किसी महिला के स्तन को छूना और उसके पायजामे की डोरी खींचना बलात्कार नहीं है, बल्कि यह केवल “वस्त्र उतारने की नीयत से किया गया हमला” है। इस टिप्पणी ने पूरे देश को झकझोर दिया।

कानूनी विशेषज्ञ पिंकी आनंद ने इस फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि यह गंभीर अपराध को हल्के में लेने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है। केंद्रीय मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने भी अपनी नाराज़गी जताते हुए कहा कि ऐसे फैसले न केवल महिलाओं की सुरक्षा को कमजोर करते हैं, बल्कि समाज में यह संदेश देते हैं कि स्त्री के शरीर के साथ की गई हिंसा को आसानी से कम गंभीर करार दिया जा सकता है।

यह सिर्फ एक फैसला नहीं था, यह उस सोच का प्रतिबिंब था जिसमें स्त्री के शरीर के प्रति हिंसा को भी तकनीकी शब्दों और कानूनी परिभाषाओं की आड़ में बाँट दिया जाता है। क्या किसी महिला की निजता का हनन तब तक बलात्कार नहीं कहलाता जब तक अपराधी अंत तक न पहुँच जाए? क्या पीड़िता के लिए वह अनुभव कम भयावह, कम आक्रामक, कम अपमानजनक होता है? इस तरह के फैसले हमारी न्याय प्रणाली के भीतर मौजूद उस असंवेदनशीलता को उजागर करते हैं, जो पीड़ित के अनुभव से ज़्यादा धारा नंबर को महत्व देती है।

हर दिन होते हैं 82 बलात्कार:

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से उपजे आक्रोश के बीच हमें यह भी समझना होगा कि भारत में बलात्कार केवल एक ‘घटना’ नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक संकट है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के मुताबिक,  भारत में हर दिन औसतन 82 महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं। यह संख्या केवल दर्ज मामलों की है असली संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है, क्योंकि बहुत सी महिलाएं शर्म, डर, या यह कहें कि  सामाजिक दबाव के कारण चुप रह जाती हैं।

हर तीन में से एक महिला को अपने जीवन में कभी न कभी यौन या शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ता है। यह आंकड़ा सिर्फ अपराध नहीं, एक सामाजिक मानसिकता को दर्शाता है, जिसमें महिला की सुरक्षा को हमेशा उसके व्यवहार, कपड़ों, या चाल-ढाल से जोड़ दिया जाता है।

एक अध्ययन के अनुसार 51% पुरुषों का मानना है कि महिलाओं का व्यवहार ही उन्हें ऐसे हालात में डालता है। यह सोच बेहद खतरनाक है, क्योंकि यह अपराध को जायज़ ठहराने का मार्ग बनाती है। यह सोच बलात्कारी के कंधे से ज़िम्मेदारी हटाकर  पीड़िता पर डाल देती है और यही मानसिकता अदालतों और जांच एजेंसियों तक भी पहुंच जाती है।

बलात्कार के 80% से ज्यादा मामलों में आरोपी को सज़ा नहीं मिलती, और लगभग 75% मामलों में आरोपी अदालत से बरी हो जाते हैं। यानी हर चार में से तीन बार, आरोपी कानून की पकड़ से निकल जाता है  या तो सबूतों के अभाव में, या सिस्टम की लापरवाही के कारण, या फिर पीड़िता को ही कठघरे में खड़ा करके।

इन आंकड़ों को देखकर यह सवाल बार बार उठता है  क्या हमारे देश में बलात्कार पीड़िता को न्याय मिल पाता है? या उसे दोहरी सज़ा भुगतनी पड़ती है पहले अपराध की, और फिर सिस्टम की? जहां अदालतों में पीड़िता की आवाज़ से ज्यादा उसके चरित्र की जांच होती है, जहां समाज उसके घावों पर मरहम नहीं, ताने देता है, और जहां अपराधी, सिस्टम की कमज़ोरियों की आड़ में मुस्कुराता हुआ बाहर निकल जाता है, वहां न्याय एक खोखला शब्द बनकर रह जाता है।

अब ज़रूरी है बदलाव: 

इसलिए आज जरूरत है एक संवेदनशील न्याय व्यवस्था की, जो सिर्फ साक्ष्यों पर नहीं, समझ और सहानुभूति पर भी आधारित हो। जजों और वकीलों को सिर्फ कानून की धाराएं नहीं, इंसानी संवेदनाएं भी पढ़ाई जानी चाहिए। उन्हें यह सिखाया जाना चाहिए कि पीड़िता से कैसे बात की जाए, कैसे उसके अनुभव को सम्मान के साथ सुना जाए, और कैसे अपराधी को कठघरे में खड़ा किया जाए ना कि  पीड़िता को।

जब तक अदालतें यह नहीं समझेंगी कि एक महिला का चुप रह जाना उसकी कमजोरी नहीं, उसका डर हो सकता है  तब तक सच्चा न्याय अधूरा रहेगा। बलात्कार के बाद एक महिला का सबसे बड़ा संघर्ष सिर्फ अपराध से नहीं, उस न्याय प्रणाली से होता है जो उसे ही शक की नजरों से देखती है। अब वक्त है सवाल बदलने का,  “उसने क्या पहना था?” से आगे बढ़कर पूछिए, “उसके साथ क्या हुआ, और हम उसके लिए क्या कर सकते हैं?”

हमें अदालतों की भाषा से लेकर सामाजिक बातचीत तक, सब कुछ बदलने की ज़रूरत है।

Wednesday, March 5, 2025

डॉ. भीमराव अंबेडकर और जाति व्यवस्था: आज भी उतने ही ज़रूरी क्यों हैं?

 

डॉ. भीमराव अंबेडकर और जाति व्यवस्था: आज भी उतने ही ज़रूरी क्यों हैं?

डॉ. भीमराव अंबेडकर, जिन्हें हम प्यार से बाबासाहेब कहते हैं, सिर्फ संविधान निर्माता ही नहीं थे, बल्कि एक ऐसे समाज सुधारक थे जिन्होंने भारत की जाति व्यवस्था को बहुत गहराई से समझा और उस पर खुलकर सवाल उठाए। उनकी बातें आज भी हमें सोचने पर मजबूर करती हैं, क्या वाकई हमारे समाज से जाति खत्म हो गई है? या फिर उसका रूप बस बदल  सा गया है?  बाबासाहेब भी एक इंसान ही  थे  सीमाओं और गलतियों वाले। लेकिन उन्होंने उन सीमाओं को पार किया और एक महान चिंतक बने। उन्हें समझने और सम्मान देने का सही तरीका यही है कि हम उनकी बातों को आज के समाज की समस्याओं से जोड़ें और उनसे मार्गदर्शन लें।

डॉ. अंबेडकर का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जो समाज की सबसे निचली सीढ़ी पर था। लेकिन उन्होंने शिक्षा को अपना हथियार बनाया और दुनिया की सबसे ऊँची यूनिवर्सिटियों से डिग्रियाँ हासिल कीं। उन्होंने बताया कि अगर मौका और शिक्षा मिले तो कोई भी इंसान कुछ भी हासिल कर सकता है। उनका एक कथन था कि “राजनीति में व्यक्ति पूजा  समाज को नुकसान पहुंचाती है।” यानी किसी भी नेता को भगवान बनाकर पूजना खतरनाक हो सकता है।

जाति आज भी क्यों ज़रूरी मुद्दा है:

आज भी भारत में जाति व्यवस्था पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। डॉ. अंबेडकर के समय जैसी थी, वैसी ही अब भी कई जगह देखने को मिलती है। हो सकता है कि अब जाति के आधार पर भेदभाव खुलकर कम होता हो, लेकिन हमें रोज़ खबरों में इसके कई उदाहरण मिलते हैं। आज भी निचली जातियों के लोगों को सिर्फ उनके जन्म की वजह से भेदभाव झेलना पड़ता है।

इसलिए डॉ. अंबेडकर को सबसे बड़ा जाति सुधारक माना जाता है। उनसे पहले महात्मा फुले, श्री नारायण गुरु और गांधी जी ने भी जाति के खिलाफ काम किया था, लेकिन डॉ. अंबेडकर की सोच सबसे अलग और गहरी थी। वे आज भी उतने ही ज़रूरी और प्रासंगिक हैं।

डॉ. अंबेडकर की जाति को लेकर सोच:

डॉ. अंबेडकर ने जाति को कभी  भी सिर्फ एक इंसान की सोच या नैतिकता की समस्या नहीं माना, जैसा कि गांधी जी सोचते थे। उन्होंने अपनी किताब “Annihilation of Caste” (जाति का उन्मूलन) में साफ लिखा कि जाति और छुआछूत की जड़ें हमारे धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में छिपी हुई हैं। उनके अनुसार, लोग इसलिए जाति का पालन करते हैं क्योंकि वे धर्म को मानते हैं, न कि इसलिए कि वे बुरे या मूर्ख हैं।

डॉ. अंबेडकर का मानना था कि जब कोई बच्चा ऐसे माहौल में बड़ा होता है जहाँ जाति को सामान्य और सही माना जाता है, तो वह भी वैसे ही सोचने लगता है। वह जाति के आधार पर दूसरों को ऊँचा या नीचा समझने लगता है। यह सोच धीरे धीरे उसकी आदत बन जाती है। यही वजह है कि जातिवाद सिर्फ एक व्यक्ति की सोच नहीं, बल्कि पूरे समाज की बनायी हुई व्यवस्था है।

यह बात सिर्फ जाति तक ही  सीमित नहीं है। डॉ. अंबेडकर ने समझाया कि यह हर उस भेदभाव पर लागू होती है जो जन्म के आधार पर होता है, जैसे औरतों को कमजोर समझना, या काले रंग के लोगों को नीचा मानना। जब समाज किसी समूह को बचपन से ही कमतर दिखाता है, तो फिर वह भेदभाव पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है।

इसलिए  बाबासाहेब  ने जाति को मिटाने के लिए सिर्फ कानून बदलने की बात नहीं की, बल्कि लोगों की सोच और धर्म की व्याख्या को भी बदलने पर ज़ोर दिया। उनका मानना था कि जब तक धर्म के नाम पर भेदभाव को सही ठहराया जाएगा, तब तक जातिवाद बनी रहेगी और ऐसे  समाज में  कभी सच्ची बराबरी नहीं आ सकती।

जाति को बनाए रखने वाली सोच और व्यवस्था

डॉ. अंबेडकर का मानना था कि जाति व्यवस्था सिर्फ पुराने समय की बात नहीं है, बल्कि यह आज भी हमारे समाज में इसलिए चल रही है क्योंकि समाज ने कुछ ऐसे नियम बना रखे हैं जो इसे ज़िंदा रखते हैं। इसे बनाए रखने में सबसे बड़ा कारण  है अलग अलग जातियों के बीच शादी करने  पर रोक लगाना और बच्चों को बचपन से ही जाति के फर्क सिखाना। जब किसी बच्चे को शुरू से यह बताया जाता है कि समाज में अच्छा समझे जाने के लिए जाति के नियमों को मानना जरूरी है, तो वह डरने लगता है कि अगर उसने जाति के बाहर शादी की, या किसी और जाति के लोगों के साथ घुल-मिलकर रहा, तो समाज उसे नकार देगा। यही डर लोगों को जाति के दायरे में ही रहने को मजबूर करता है।

डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि अस्पृश्यता की जड़ इस बात में है कि लोग अपनी ही जाति में शादी करें। जब जातियों के बीच शादी नहीं होती, तो लोग साथ खाना-पीना या घुलना-मिलना भी पसंद नहीं करते। यही भेदभाव की शुरुआत होती है।

जाति खत्म करने का रास्ता: शिक्षा और समाज में बदलाव

डॉ. अंबेडकर का मानना था कि जाति को खत्म करने के लिए न तो हिंसा जरूरी है और न ही ऊँची जातियों से नफरत करना। उनका रास्ता शांति, समझदारी और बदलाव का था। वे मानते थे कि जाति व्यवस्था को खत्म करने के लिए समाज में एक बड़ा बदलाव यानी सामाजिक क्रांति जरूरी है और वो मानते थे कि इस क्रांति की शुरुआत होती है शिक्षा से।

डॉ. अंबेडकर खुद एक ऐसी जाति से आते थे जिसमें उन्हें बहुत भेदभाव झेलना पड़ा था, लेकिन उन्होंने पढ़-लिखकर अपने हक के लिए आवाज़ उठाई और लाखों लोगों को जागरूक किया। उनके लिए शिक्षा ही सबसे बड़ा हथियार था। उनकी लड़ाई किसी एक जाति या व्यक्ति से नहीं थी, बल्कि उस पूरी व्यवस्था से थी जो लोगों को जन्म के आधार पर ऊँचा या नीचा समझती है। और इस व्यवस्था को तोड़ने का सबसे बड़ा और असरदार तरीका है, हर इंसान को अच्छी और बराबरी वाली शिक्षा देना, ताकि सभी को सोचने, समझने और आगे बढ़ने का बराबर मौका मिल सके

Tuesday, March 4, 2025

रोहतास गढ़ : बिहार का भूला-बिसरा स्वर्णिम इतिहास



बिहार की धरती अपने भीतर अनगिनत कहानियाँ समेटे हुए है। इनमें से एक अनमोल विरासत है रोहतास गढ़ क़िला। कैमूर की पहाड़ियों पर बसा यह क़िला इतिहास, वास्तुकला और वीरता का अनोखा संगम है। आज भले ही यह क़िला खंडहरों में बदल गया है, लेकिन इसकी दीवारें आज भी सदियों पुरानी कहानियाँ फुसफुसाती हैं।

प्राकृतिक सुरक्षा और शिल्प का अद्भुत मेल:

करीब 1500 फीट की ऊँचाई पर बना यह क़िला चारों ओर से खाई और घने जंगलों से घिरा है, जिससे दुश्मनों के लिए इसमें घुस पाना बहुत कठिन था। यह न सिर्फ़ एक सैनिक क़िला था, बल्कि इसमें एक पूरा शहर बसाया गया था – जिसमें मंदिर, महल, कुंए, बावड़ियाँ और सैनिकों के रहने के स्थान शामिल थे।

शेरशाह सूरी और रोहतास :

16वीं शताब्दी में इस क़िले को शेरशाह सूरी ने और भी मज़बूत बनवाया। उन्होंने यहाँ हिंदू और अफ़ग़ानी शिल्पशैली को मिलाकर कई सुंदर इमारतें बनवायीं। सबसे प्रसिद्ध इमारतों में रानी का महल, जामा मस्जिद, और हथीया पोखरा शामिल हैं।

स्वतंत्रता संग्राम में योगदान:

1857 की क्रांति के समय यह क़िला स्वतंत्रता सेनानियों की शरणस्थली बना। अंग्रेजों से छिपते हुए कई सेनानियों ने यहीं से अपने अभियान चलाए। अंग्रेजों ने इस क़िले को नष्ट करने की कोशिश की, लेकिन इसकी चट्टानों जैसी दीवारों ने सब सह लिया।

बिलकुल! नीचे दिए गए पैराग्राफ़ को मैंने सरल और आसान शब्दों में दोबारा लिखा है, ताकि इसे समझना और पढ़ना और भी सहज हो:

दिसंबर 2011: रोहतास गढ़ के लिए एक ऐतिहासिक महीना

दिसंबर 2011 का महीना रोहतास गढ़ क़िले के लिए बहुत खास रहा। इसी महीने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस क़िले का दौरा किया और इसके विकास के लिए कई योजनाओं की घोषणा की। यह पहली बार था जब किसी मुख्यमंत्री ने कैमूर के इस दूर-दराज़ इलाके में आकर क़िले का भ्रमण किया। उनका यह दौरा एक नई उम्मीद लेकर आया और यह साबित कर दिया कि रोहतास गढ़ में अब बदलाव की शुरुआत हो चुकी है।


रोहतास गढ़ का पर्यटन आकर्षण:

ऊँचे पहाड़ों, गहरी घाटियों, घने जंगलों, झीलों, झरनों और नदियों से घिरा हुआ रोहतास गढ़ क़िला अपने प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। यहाँ आने वाले पर्यटक इसकी शांत और हरी-भरी वादियों में खो जाते हैं। यह जगह प्राकृतिक दृश्यों से भरपूर है, जो हर किसी का मन मोह लेती है।


रोहतास गढ़ की ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक धरोहरें:

प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ रोहतास गढ़ में कई ऐसे ऐतिहासिक और पुरानी धरोहरें हैं, जो आज भी बहुत खास हैं। ये जगहें कई सौ सालों से समय की मार झेलती आ रही हैं, लेकिन आज भी अपनी पहचान बनाए हुए हैं। आइए जानते हैं कुछ प्रमुख धरोहरों के बारे में:

1. हथिया पोल  
यह क़िले का मुख्य और सबसे बड़ा दरवाज़ा है, जिसका निर्माण सन 1597 में हुआ था। इस दरवाज़े पर सुंदर हाथियों की मूर्तियाँ बनी हैं, इसी वजह से इसे "हथिया पोल" कहा जाता है।

2. आईना महल  
यह एक सुंदर और भव्य महल है जिसे राजा मानसिंह ने अपनी पत्नी के लिए बनवाया था। इसका नाम ही बताता है कि यह कभी बहुत चमकदार और सुंदर रहा होगा।

3. तख़्त-ए-बादशाही  
यह क़िले की सबसे बड़ी इमारत है, जिसे राजा मानसिंह ने खुद के रहने के लिए बनवाया था। यह चार मंज़िला है, जिसमें गुंबद और नक्काशीदार खंभे हैं। इसकी छत से पूरे इलाके का नज़ारा दिखता है।

4. बारादरी  
यह इमारत राजा मानसिंह के रहने की जगह का हिस्सा थी और जनाना (महिलाओं का हिस्सा) से जुड़ी थी। इसके पास ही दीवाने-ख़ास था, जिसे सुंदर फूल-पत्तियों की नक्काशी से सजाया गया है।

5. जामी मस्जिद, हब्श खां की दरगाह और सूफ़ी सुल्तान का मक़बरा
शेरशाह सूरी के समय में, 1543 में बनी यह मस्जिद सफेद बलुआ पत्थर से बनी है और इसमें तीन गुंबद हैं। इसके आस-पास बनी अन्य इमारतें राजपूताना शैली की छतरी जैसी हैं और देखने में बहुत सुंदर हैं।

6. गणेश मंदिर  
यह मंदिर राजा मानसिंह के महल से लगभग आधा किलोमीटर दूर है। इसका निर्माण 17वीं सदी में चित्तौड़ के मीराबाई मंदिर की शैली में हुआ था। इसके गर्भगृह (मुख्य भाग) के आगे दो सुंदर द्वार-मंडप हैं।

7. फांसी घर  
क़िले के पश्चिम की ओर एक पुरानी इमारत है, जिसे लोग फांसी घर कहते हैं। इसके पास ही करीब 1500 फीट गहरी खाई है। यहीं एक फ़क़ीर की मज़ार है जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्हें तीन बार खाई में फेंका गया, लेकिन वे हर बार सुरक्षित बच गए।

8. रोहतासन या चौरासन मंदिर 
यह मंदिर क़िले से लगभग डेढ़ किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित है। यह भगवान शिव का मंदिर है। इसकी छत को पुराने समय में तोड़ दिया गया था। अब यहां तक पहुँचने के लिए 84 सीढ़ियाँ बची हैं, इसी वजह से इसे "चौरासन मंदिर" भी कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यह मंदिर राजा हरिश्चंद्र के समय का है। पास में एक देवी का प्राचीन और सुंदर मंदिर भी है।


वर्तमान में उपेक्षा का शिकार :

इतिहास के इतने गौरवशाली पन्नों को समेटे हुए यह क़िला आज वीरान पड़ा है। न सरकार की खास निगरानी है और न ही स्थानीय प्रशासन की। पर्यटक आते हैं, पर जानकारी और सुविधाओं की भारी कमी महसूस होती है।


रोहतास गढ़ सिर्फ़ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, यह बिहार के गौरव का प्रतीक है। ज़रूरत है कि हम इसके इतिहास को न सिर्फ़ किताबों में, बल्कि अपनी चेतना में भी ज़िंदा रखें। इस धरोहर को संजोना हम सबकी जिम्मेदारी है।

रोहतासगढ़ किले की यात्रा जानकारी
अगर आप इस ऐतिहासिक किले की यात्रा करना चाहते हैं, तो इसका सबसे अच्छा समय अक्टूबर से फरवरी के बीच का होता है। गर्मियों में यहां चढ़ाई करना कठिन हो सकता है, जबकि बारिश के मौसम में पहाड़ी रास्ते फिसलन भरे हो सकते हैं।

इस किले तक पहुंचने के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन सासाराम (लगभग 45 किमी) है, जबकि निकटतम हवाई अड्डा पटना (लगभग 150 किमी) में स्थित है। सासाराम और डेहरी-ऑन-सोन से टैक्सी या बस द्वारा इस किले तक पहुंचा जा सकता है।

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Monday, March 3, 2025

रोहित शर्मा की फिटनेस पर सवाल उठाना सही या बॉडी शेमिंग?


चैंपियंस ट्रॉफी में शानदार जीत के बाद भी रोहित शर्मा की फिटनेस पर निशाना आखिर क्यों?
खेल का मैदान खिलाड़ियों के प्रदर्शन को आंकने का सही पैमाना होता है, लेकिन जब खेल से इतर निजी टिप्पणियां होने लगें, तो विवाद खड़ा होना तय है।

 भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रोहित शर्मा को लेकर कांग्रेस प्रवक्ता डॉ. शमा मोहम्मद के बयान ने यही दर्शाया। न्यूजीलैंड के खिलाफ भारत की जीत के बाद जब देश खुशी मना रहा था, तब उन्होंने रोहित की फिटनेस और कप्तानी पर सवाल उठाते हुए कहा कि वह "मोटे" हैं और भारत के सबसे निराशाजनक कप्तान हैं।

 यह टिप्पणी राजनीतिक गलियारों में विवाद का कारण बनी और भाजपा ने इसे बॉडी शेमिंग और एक सेल्फमेड चैंपियन का अपमान करार दिया। बाद में कांग्रेस को हस्तक्षेप करना पड़ा और शमा को अपने ट्वीट डिलीट करने पड़े।  

क्या रोहित की फिटनेस और कप्तानी पर सवाल उठाना सही है?  

रोहित शर्मा भारतीय क्रिकेट के दिग्गज खिलाड़ियों में शुमार हैं। उनके नेतृत्व में भारत ने कई महत्वपूर्ण जीत दर्ज की हैं, और उनकी बल्लेबाजी क्षमता किसी से छिपी नहीं है। यह सही है कि खेल में फिटनेस का महत्व बहुत अधिक होता है, लेकिन किसी खिलाड़ी के वजन को आधार बनाकर उनकी काबिलियत पर सवाल उठाना क्या उचित है?  

शमा मोहम्मद ने अपनी टिप्पणी में रोहित की तुलना सचिन तेंदुलकर, विराट कोहली, महेंद्र सिंह धोनी और अन्य पूर्व दिग्गजों से की, यह कहते हुए कि रोहित "औसत दर्जे" के कप्तान हैं, जिन्हें बस किस्मत से टीम की कमान मिल गई। इस तरह की तुलना करना सही नहीं होगा क्योंकि हर खिलाड़ी की नेतृत्व शैली और योगदान अलग होता है। क्या केवल आंकड़ों के आधार पर किसी कप्तान को अच्छा या बुरा ठहराना सही है? अगर ऐसा होता, तो कई महान कप्तानों को उनके करियर के शुरुआती दौर में ही नाकाम माना जा सकता था।  

खेल मंत्री और कांग्रेस का रुख

इस विवाद के बढ़ने के बाद खेल मंत्री मनसुख मंडविया ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और टीएमसी को खिलाड़ियों को अकेला छोड़ देना चाहिए और उनकी चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाने से बचना चाहिए। यह सच है कि खिलाड़ी देश के लिए खेलते हैं और वे अपने प्रदर्शन को लेकर सबसे ज्यादा सजग होते हैं। इस तरह की टिप्पणियां न केवल उनके आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकती हैं, बल्कि उनके प्रयासों को भी कमतर दिखाने का काम करती हैं।  

कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा को भी यह मामला संभालने के लिए सामने आना पड़ा। उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी खेल हस्तियों का सम्मान करती है और शमा मोहम्मद के बयान कांग्रेस की विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करते। उन्हें अपने बयान हटाने को कहा गया और भविष्य में ज्यादा सावधानी बरतने की सलाह दी गई।  

क्या चैंपियंस ट्रॉफी के दौरान ऐसी बयानबाजी उचित थी? 

भारतीय टीम जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी धाक जमा रही हो, तब इस तरह की बयानबाजी टीम के मनोबल पर असर डाल सकती है। आलोचना खेल का हिस्सा है, लेकिन जब यह व्यक्तिगत टिप्पणियों का रूप ले ले, तो खेल भावना को ठेस पहुंचती है। शमा मोहम्मद ने बाद में सफाई देते हुए कहा कि उनका इरादा अपमान करना नहीं था, लेकिन यह भी ध्यान देने वाली बात है कि सार्वजनिक मंच पर दिए गए बयान का असर व्यापक होता है।  

एक खिलाड़ी की आलोचना उनके खेल प्रदर्शन पर होनी चाहिए, न कि उनकी शारीरिक बनावट या किसी और व्यक्तिगत पहलू पर। क्या हम सचिन तेंदुलकर, वीरेंद्र सहवाग या अन्य महान खिलाड़ियों को उनके शरीर के आधार पर आंक सकते हैं? नहीं, क्योंकि क्रिकेट सिर्फ फिटनेस का खेल नहीं, बल्कि तकनीक, मानसिक मजबूती और अनुभव का खेल भी है।  



राजनीतिक गलियारों में खेल से जुड़े मामलों पर बयानबाजी अक्सर विवादों को जन्म देती है, और यह घटना भी इसका उदाहरण है। चैंपियंस ट्रॉफी के बीच इस तरह की बयानबाजी से बचना जरूरी था, क्योंकि यह टीम के प्रदर्शन पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। अगर आलोचना करनी ही है, तो वह उनके खेल और रणनीति पर होनी चाहिए, न कि उनके शरीर के आकार या किस्मत के आधार पर।  


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Saturday, March 1, 2025

सुपरवुमन सिंड्रोम: क्यों महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि वे सबकुछ संभालें?

सुपरमैन कुछ भी नहीं है, क्योंकि मैं एक सुपरवुमन हूं। कम से कम समाज तो यही चाहता है कि मैं ऐसी बनूं।

हम महिलाओं को तब सराहा और प्रशंसा की जाती है जब हम सबकुछ संभालने में सक्षम होती है।एक सफल करियर, एक परिवार और साथ ही समाज की वह "आदर्श" महिला बनने की कोशिश करती हैं, जो शिक्षित तो हो लेकिन अधिक मुखर न हो, जो अपने पति से अधिक कमाने की इच्छा न रखे लेकिन घर की आर्थिक ज़रूरतों में योगदान दे सके, और जब जरूरत पड़े तो अपने सपनों को त्यागकर परिवार को प्राथमिकता देने के लिए तैयार रहे।

नीलांजना भौमिक अपनी पुस्तक “Lies Our Mothers Told Us” में उन दो सबसे हानिकारक आदतों के बारे में बात करती हैं, जिनका शिकार अधिकांश महिलाएं होती हैं। लोगों को खुश करने की आदत और "सबकुछ हासिल करने" की कोशिश। अधिकांश महिलाएं इस बात से जुड़ाव महसूस करेंगी कि कैसे उन्होंने हमेशा खुद को दूसरों की अपेक्षाओं में ढालने की कोशिश की, और इस प्रक्रिया में वे यह भूल गईं कि वे वास्तव में कौन हैं। यही सुपरवुमन सिंड्रोम है।

मैंने भी अपने जीवन की अधिकांश महिलाओं से यही सीखा है। सबकुछ हासिल करना, हर भूमिका को निभाना, ताकि यह साबित कर सकूं कि मैं अपने सपनों को पूरा करने के योग्य हूं, साथ ही अपनी पारंपरिक ज़िम्मेदारियों को भी निभा सकूं, और जब समय आए तो परिवार के लिए सबकुछ छोड़ने के लिए भी तैयार रहूं। महिलाएं हमेशा संतुलन बनाने की इस जंग को लड़ती हैं। एक तरफ पेड वर्क यानी पेशेवर कार्य और दूसरी तरफ अनपेड वर्क यानी घर और परिवार की देखभाल। यह सब बिना किसी संस्थागत या पारिवारिक सहयोग के, और कार्यस्थल पर भेदभाव का सामना करते हुए। समाज इसे महिलाओं की "सुपरपावर" के रूप में देखता है। अगर कोई महिला इसे नहीं कर पाती, तो उसे विफल माना जाता है।

सुपरवुमन सिंड्रोम की शुरुआत

सुपरवुमन सिंड्रोम, जो 1980 के दशक में नारीवादी विमर्श का हिस्सा बना, वास्तव में महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता का एक प्रतिफल है। डॉ. मार्जोरी हैंसन चावेज़ ने अपनी पुस्तक के माध्यम से इस अवधारणा को प्रस्तुत किया। यह शब्द उन सामाजिक दबावों को दर्शाता है, जिनमें महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि वे एक साथ कई भूमिकाओं में उत्कृष्टता हासिल करें। एक पेशेवर, माँ, पत्नी, दोस्त और बेटी के रूप में। और वह भी उच्च मानकों के साथ। इस निरंतर जूझने की प्रक्रिया में महिलाएं अपनी खुद की भलाई को नज़रअंदाज़ करने लगती हैं, जिससे तनाव, चिंता और थकावट जैसी समस्याएं पैदा होती हैं।

हमने शिक्षा और कार्यक्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी तो बढ़ा ली है, लेकिन हमने अपने अंदर जमीं पूर्वाग्रहों को मिटाने और महिलाओं के लिए एक बेहतर प्रणाली विकसित करने की दिशा में पर्याप्त काम नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि महिलाओं ने खुद भी इस संघर्ष को अपनी स्वतंत्रता की कीमत के रूप में स्वीकार कर लिया है। हम अपनी आर्थिक आज़ादी को अपना अधिकार मानने के बजाय इसे एक बंदिशों से भरा सौदा मानते हैं। अगर हमें बाहर जाकर काम करने की अनुमति दी जा रही है, तो हमें घर की ज़िम्मेदारियां भी बिना किसी शिकायत के निभानी होंगी।

सुपरवुमन सिंड्रोम के गहरे प्रभाव

इस सिंड्रोम के असर सिर्फ "सबकुछ हासिल करने" की कोशिश तक सीमित नहीं हैं। यह असफलता के डर से भी जुड़ा हुआ है। महिलाओं को असफल होने की अनुमति नहीं होती, क्योंकि अगर वे किसी चीज़ में विफल होती हैं, तो उन्हें यह कहकर हतोत्साहित कर दिया जाता है कि वे "इस योग्य नहीं थीं"। पुरुषों को गलतियाँ करने और उनसे सीखने का अवसर मिलता है, लेकिन महिलाओं के लिए एक विफलता का अर्थ है कि उन्हें कोशिश ही नहीं करनी चाहिए थी। एक सुपरवुमन कैसे असफल हो सकती है?

अगर कोई महिला अपने करियर में किसी कारणवश धीमी गति से आगे बढ़ने का फैसला करती है, तो उसे तुरंत "कमज़ोर" या "अक्षम" मान लिया जाता है। वहीं, अगर कोई महिला हाउसवाइफ बनना चाहती है, तो उसे "सिर्फ एक गृहिणी" कहकर उसकी मेहनत को नकार दिया जाता है। यह दोहरा मापदंड स्पष्ट रूप से दिखाता है कि जो महिलाएं करियर पर ध्यान केंद्रित करती हैं, उन्हें "परिवार की उपेक्षा करने वाली" कहकर आलोचना झेलनी पड़ती है, और जो महिलाएं परिवार को प्राथमिकता देती हैं, उन्हें "आलसी" समझा जाता है। इस निरंतर सामाजिक दबाव के कारण महिलाओं में अत्यधिक तनाव और चिंता देखने को मिलती है।

सुपरवुमन सिंड्रोम से कैसे उबरा जाए?

इस मानसिकता को बदलने के लिए समाज और व्यक्तिगत स्तर पर बदलाव लाना बेहद ज़रूरी है। सबसे पहले, महिलाओं को यह स्वीकार करना होगा कि हर भूमिका में उत्कृष्टता प्राप्त करना अवास्तविक है और ऐसा करने की कोशिश में उनकी अपनी भलाई दांव पर लग सकती है। खुद की देखभाल करना, सीमाएं तय करना, कामों को बांटना और ना कहना सीखना।यह सभी चीजें महिलाओं को इस दबाव से मुक्त कर सकती हैं।

साथ ही, महिलाओं को इस बात का अपराधबोध महसूस करना बंद करना होगा कि वे "सबकुछ नहीं कर सकतीं"। हमें यह समझने की जरूरत है कि एक महिला की कीमत इस बात से तय नहीं होती कि वह कितनी भूमिकाओं को एक साथ निभा सकती है।

इसके अलावा, कार्यस्थलों और समाज को भी यह स्वीकार करना होगा कि महिलाओं को हर समय "सुपरवुमन" बने रहने की ज़रूरत नहीं है। कार्यस्थलों को अधिक लचीली कार्य-नीतियां अपनानी चाहिए, ताकि महिलाएं संतुलित जीवन जी सकें। साथ ही, परिवारों को भी महिलाओं की जिम्मेदारियों को समान रूप से साझा करने की आवश्यकता है।

सुपरवुमन सिंड्रोम से मुक्त होना सिर्फ महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज की प्रगति के लिए आवश्यक है। जब हम महिलाओं पर से यह अनावश्यक दबाव हटाएंगे और उनकी मेहनत को सही मायनों में सराहेंगे, तभी महिलाएं स्वस्थ, खुशहाल और अधिक प्रभावशाली जीवन जी पाएंगी।

महिलाओं को हर समय सबकुछ संभालने की ज़रूरत नहीं है। असली ताकत इस बात में है कि वे अपने लिए क्या चुनती हैं।चाहे वह करियर हो, परिवार हो, या दोनों का संतुलन। हमें महिलाओं को उनकी चुनौतियों के बजाय उनके योगदान के लिए सराहना सीखनी होगी। यही असली नारी सशक्तिकरण है।

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