Tuesday, April 15, 2025

क्या अब भी रंगभेद हमारे समाज में सामान्य बात है?

 

क्या अब भी रंगभेद हमारे समाज में सामान्य बात है?

आज भी हमारे समाज में लोगों के रंग के आधार पर भेदभाव किया जाता है। जिसे हम “Racism” कहते हैं। खासकर गहरे या सांवले रंग वालों को लेकर जो मज़ाक उड़ाया जाता है, वो हमारे समाज में अब भी आम बात है। सांवले या गहरे रंग वाले लोगों को अक्सर “कम सुंदर,” “गंवार,” या “कमतर” समझा जाता है। इसका असर न सिर्फ उनके आत्मसम्मान पर पड़ता है, बल्कि उनके सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में भी भेदभाव का कारण बनता है। बचपन से ही जब किसी बच्चे को “काला”, “काली-कलूटी”, “झारखंड से आया है क्या?” जैसे शब्दों से चिढ़ाया जाता है, तो ये सिर्फ मज़ाक नहीं होता, ये उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डालता है। धीरे-धीरे वे खुद को दूसरों से इतना कम समझने लगते हैं कि उनका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है।

रंगभेद की समस्या की जड़ें इतनी गहरी हैं कि अक्सर हम इसे “नॉर्मल” मान लेते हैं, और यही सबसे बड़ी त्रासदी है। हमारे समाज में कई बार रंगभेद को मजाक, संस्कृति, या रूढ़ि के नाम पर छिपा दिया जाता है। जब कोई कहता है “गोरी बहू चाहिए”, तो बहुत से लोग इसे सामान्य मानते हैं, जैसे यह कोई विशेष योग्यता हो। लेकिन क्या कभी किसी ने यह सवाल उठाया कि क्यों? क्या सांवली लड़की में समझदारी, प्यार , या सामर्थ्य की कमी होती है?

इसी तरह, “गोरी लड़की ही सुंदर होती है” जैसी बात सुनते सुनते लड़कियाँ खुद को आइने में देख कर हीन महसूस करने लगती हैं। वे सोचती हैं कि वे सुंदर नहीं हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि उनका रंग  सांवला है। यह मानसिकता उनकी आत्मछवि को तोड़ देती है।

मीडिया और इंडस्ट्री का प्रभाव:

हमारी फिल्मों, विज्ञापनों और फैशन इंडस्ट्री में भी गिने चुने सांवले चेहरे होते हैं। मीडिया  हमारी सोच को बहुत प्रभावित करता है। जब हम लगातार फिल्मों या विज्ञापनों में गोरे लोगों को सुंदर, सफल और अच्छे किरदारों में देखते हैं, तो हमें लगता है कि केवल गोरा रंग ही अच्छा होता है। इसी वजह से कई लोग अपने रंग को लेकर हीन भावना महसूस करने लगते हैं।

कुछ कंपनियाँ गोरा बनने वाली क्रीम का बहुत प्रचार करती हैं, जिससे लगता है कि सांवला रंग होना गलत है। यह सोच बहुत गलत है, क्योंकि इंसान की पहचान उसके रंग से नहीं, उसके विचार और कर्मों से होती है। हालांकि आज भी कुछ कंपनियां ऐसी भी है जो हर रंग सुंदर होता है इसके लिए अभियान चला रही है।

Dove कंपनी, जिसने “Real Beauty” नाम से एक अभियान चलाया। इस अभियान में Dove ने अलग अलग रंग, आकार और पृष्ठभूमि की महिलाओं को दिखाया और बताया कि सुंदरता किसी खास रंग में नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और खुद से प्यार करने में होती है। ऐसे सकारात्मक संदेश समाज में रंगभेद की सोच को कम करने में मदद करते हैं और लोगों को यह समझाते हैं कि हर रंग की अपनी खूबसूरती होती है। मीडिया को चाहिए कि वह इस तरह की सोच को और बढ़ावा दे ताकि एक बराबरी वाला और सम्मानजनक समाज बन सके।

बचपन से ही हीन भावना: 
जब कोई बच्चा सांवले रंग के साथ पैदा होता है, तो बचपन से ही उसे ताने सुनने पड़ते हैं। “कितना काला है”, “धूप में मत खेलो और काले हो जाओगे” जैसी बातें उसकी आत्मा को चोट पहुँचाती हैं। धीरे-धीरे ये बातें उस बच्चे के आत्मविश्वास को तोड़ने लगती है।  इस तरह की बाते सिर्फ मजाक नहीं, ब्लकी  मानसिक चोट है। जब कोई किसी के रंग पर टिप्पणी करता है, तो हम हँसते हैं। सोचते हैं  “अरे, मज़ाक था”। लेकिन हर  किसी के लिए वो मज़ाक नहीं होता। वो उसकी आत्मा पर एक चोट होती है। और दुख की बात तो यह है कि हम खुद ही इस मानसिकता को बढ़ावा देते हैं।

रंगभेद दोहरा मापदंड:

जब कोई विदेशी हमें “डार्क स्किन” या “ब्राउन” कहता है, तो हम गुस्से में आ जाते हैं। हमें लगता है कि ये नस्लवाद है। लेकिन क्या हमने खुद कभी अपने सांवले भाई-बहनों को खुले दिल से अपनाया है?  नहीं अपना पाये है न,  इसलिए बदलाव की जरुरत पहले खुद के घर से होनी चाहिए, फिर गांव समाज और तब जाकर पुरा देश और दुनिया।  हम “बाहरी दुनिया” से मान-सम्मान चाहते हैं,लेकिन अपने ही लोगों को उनके रंग के कारण नीचा दिखाते हैं। ये साफ़ दोहरापन है, और इससे बाहर निकलना बेहद ज़रूरी है।

सोचिए अगर सांवला रंग ही सुंदरता का पैमाना होता, तो क्या सब लोग धूप में खड़े होकर त्वचा जलाते? जैसे आज गोरे बनने के लिए लोग ब्लीच और फेयरनेस क्रीम का सहारा लेते हैं, जो सेहत के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है।

अब वक्त है बदलने का:

हमें यह समझने की बहुत ज़रूरत है कि रंग सिर्फ त्वचा का नहीं होता, पहचान का हिस्सा होता है। गोरा, सांवला या काला  ये सब प्रकृति के दिए हुए खूबसूरत रंग हैं। कोई भी रंग छोटा या बड़ा नहीं होता। किसी को सिर्फ उसके रंग के कारण ताना मारना, मज़ाक उड़ाना या उसे कम समझना एक तरह का मानसिक हिंसा है। कई बार हम सोचते हैं, “अरे, बस मज़ाक कर रहे थे,” लेकिन हो सकता है वो मज़ाक किसी के दिल को बहुत गहरा दुख दे जाए।

हर इंसान अलग होता है। रंग, रूप, बोली, पहनावा  ये सब विविधता हैं, और यही विविधता हमारे समाज को खूबसूरत बनाती है। हमें दूसरों को बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, बल्कि उन्हें जैसे हैं वैसे ही अपनाना चाहिए। यही है असली इंसानियत  जिसमें कोई भेदभाव न हो, कोई ऊँच नीच न हो, बस अपनापन हो।

अगर हम चाहते हैं कि हमारा समाज और बेहतर बने, तो हमें अपने शब्दों, सोच और व्यवहार में बदलाव लाना होगा। हर रंग को अपनाइए, हर इंसान को सम्मान दीजिए। तभी हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ पाएँगे, जहाँ हर कोई खुद पर गर्व कर सके।

सोशल मीडिया पर क्यों बढ़ रही है नफरत और कट्टरता

 

सोशल मीडिया पर क्यों बढ़ रही है नफरत और कट्टरता

आज हम सब सोशल मीडिया का खूब इस्तेमाल करते हैं। फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर, हर जगह हर दिन हजारों पोस्ट, वीडियो और राय हमारे सामने आती हैं। इंटरनेट का मकसद था कि लोग जुड़ें, विचार साझा करें और एक-दूसरे को समझें। लेकिन अब ये प्लेटफॉर्म कट्टर सोच और नफरत फैलाने का जरिया बनते जा रहे हैं।

अब लोग किसी की बात से असहमति होने पर उसे गालियाँ देने लगते हैं या ट्रोल करने लगते हैं। छोटे-छोटे मुद्दों को बड़ा बनाकर लड़ाई का माहौल बना दिया जाता है। कई बार बिना पूरी जानकारी के झूठी खबरें फैला दी जाती हैं, जिससे समाज में डर और गलतफहमी फैलती है। सोशल मीडिया का असर अब असली ज़िंदगी पर भी दिखने लगा है,  लोग कम मिलने लगे हैं, और ऑनलाइन की बहसें रिश्तों को भी बिगाड़ रही हैं। ऐसे में हमें सोचना होगा कि क्या हम सोशल मीडिया को सही तरीके से इस्तेमाल कर रहे हैं।

क्या कहता है सोशल मीडिया का सिस्टम?
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, खासकर Instagram, ऐसा कंटेंट आगे बढ़ाता है जो ज्यादा लोग देख रहे होते हैं। उसके पीछे एक एल्गोरिदम (कंप्यूटर सिस्टम) काम करता है जो उन्हीं पोस्ट्स को बार-बार दिखाता है जिन्हें ज्यादा लोगों ने पसंद किया हो या शेयर किया हो। अब होता क्या है, कोई कट्टर सोच या अजीब विचार अगर बार-बार लोगों तक पहुँचता है, तो लोग उसे आम सोच मानने लगते हैं। ये एक तरह की  गलतफहमी होती है, जिसे False Consensus Effect कहा जाता है। मतलब  एक छोटे से ग्रुप की राय, पूरे समाज की राय जैसी लगने लगती है।

लोगों में बीच की राय गायब हो गई है और इसका नतीजा ये होता है कि लोग दो हिस्सों में बंट जाते हैं, या तो पूरी तरह से उस सोच का समर्थन करते हैं, या फिर उसका पूरा विरोध। बीच में सोचने, समझने और सवाल करने वाले लोग कम हो जाते हैं सोशल मीडिया हमें मजबूर करता है कि हम किसी एक पक्ष में जाएँ  या तो हाँ कहें या ना। सोचने का मौका कम मिलता है। इसका एक अच्छा उद्हारण है, जब भारत में तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन शुरू हुआ, तब सोशल मीडिया पर इस विषय को लेकर ज़बरदस्त चर्चा होने लगी। Instagram, Twitter और Facebook जैसे प्लेटफॉर्म्स पर दोनों पक्षों  किसानों के समर्थन और विरोध  में कई पोस्ट्स वायरल होने लगे।

जो भी पोस्ट ज्यादा वायरल हुई, वही बार-बार लोगों को दिखाई देती रही। कुछ पोस्ट्स ने आंदोलन को देश विरोधी बताया, तो कुछ ने इसे पूरी तरह से सही ठहराया। ऐसे में सोशल मीडिया का एल्गोरिदम उस कंटेंट को ज़्यादा फैलाने लगा जो ज़्यादा लोगों को झटका दे या जो ज़्यादा चर्चा ला सके  चाहे वो पूरी सच्चाई हो या नहीं।

इसी दौर में एक बड़ा उदाहरण सामने आया , ग्रेटा थनबर्ग और “टूलकिट” का मामला। ग्रेटा ने किसानों के समर्थन में एक ट्वीट किया और एक डॉक्युमेंट  शेयर किया। उसके बाद सोशल मीडिया पर बवाल मच गया। कई लोगों ने बिना पूरी जानकारी के इसे देश के खिलाफ साजिश कह दिया। लोगों ने राय बनानी शुरू कर दी कुछ ने ग्रेटा को ही दुश्मन मान लिया, तो कुछ ने सरकार को। बीच की सोच, सवाल-जवाब, और गहराई से समझने की कोशिश कहीं खो सी  गई।

इस दौरान, सोशल मीडिया पर एक छोटी सोच, जैसे “जो किसान विरोध कर रहे हैं वो देशद्रोही हैं” या “जो सरकार का साथ दे रहे हैं वो किसानों के दुश्मन हैं”  इतनी बार दिखी कि लोगों को लगा यही आम सोच है। ब्लकी यही False Consensus Effect का उद्हारण है। कुछ लोगों की राय बार बार दिखने से वो सच और सामान्य लगने लगती है, जबकि हकीकत में बहुत सारे लोग तटस्थ थे या सोचने समझने में लगे थे

इसका नतीजा यह हुआ कि बहुत से लोग या तो पूरी तरह आंदोलन के साथ हो गए, या पूरी तरह सरकार के। बीच में सोचने, समझने और शांत होकर बात करने वालों की आवाज़ दबने लगी।

ऐसे में हम क्या करें:

ये घटना हमें सिखाती है कि सोशल मीडिया हमें सोचने की आज़ादी कम देता है और हमें एक तरफ झुकने पर मजबूर करता है। इसलिए ज़रूरी है कि हम हर वायरल चीज़ पर भरोसा करने से पहले खुद सोचें, सवाल करें और दोनों पक्षों को समझने की कोशिश करें।

सोशल मीडिया पर कुछ भी देखने या मानने से पहले खुद सोचिए, समझिए। किसी भी विचार को आँख बंद करके न अपनाएँ। हो सकता है जो चीज़ बहुत शेयर हो रही हो, वो सही ही हो, ऐसा जरूरी नहीं। समझदारी से फैसला लीजिए  यही एक जिम्मेदार डिजिटल नागरिक की पहचान है।

मैं तुझे फिर मिलूँगी’, लेकिन इस बार तन्हाई नहीं बनकर

 

मैं तुझे फिर मिलूँगी’, लेकिन इस बार तन्हाई नहीं बनकर

“मैं तुझे फिर मिलूँगी , उस तन्हा लम्हे में, जब औरत अपने भीतर उतरती है, और सवाल करती है, ये तन्हाई मेरे हिस्से क्यों लिखी गई?”

औरत की ज़िंदगी में अगर कोई चीज़ सबसे ज़्यादा ठूसी गई है, तो वो है चुप्पी। समाज ने उससे हर मोड़ पर चुप रहने को कहा शादी में, मोहब्बत में, रिश्तों में, विरोध में… और जब उसने बोलना चाहा, तो उसे ‘बदतमीज़’, ‘बेबाक’, ‘तेज़’ कहकर चुप करवा दिया गया।

औरतें क्या चाहती हैं?
यह सवाल बहुत सीधा सा लगता है, लेकिन इसके पीछे सदियों की चुप्पी, दर्द और संघर्ष छिपा है। क्या औरतें बहुत कुछ माँग रही हैं? नहीं। वो बस चाहती हैं , इज़्ज़त, बराबरी, सच्चा प्यार, और सबसे ज़रूरी एक ऐसी ज़िंदगी जिसमें वो बिना डर के जी सकें, साँस ले सकें। ना कोई पीछा करने वाला हो, ना कोई ताना देने वाला, ना कोई शक करने वाला। बस एक सामान्य, सम्मानजनक जीवन।

लेकिन इतिहास गवाह है कि हर युग, हर सभ्यता और हर समाज ने औरत को उसकी आत्मा, उसकी सोच, उसके सपनों से नहीं पहचाना। औरत को हमेशा परखा गया, उसके शरीर से, उसके पहनावे से, उसके चलने-फिरने, हँसने-बोलने के तरीके से। उसे ‘कैसी औरत’ है, यह तय किया गया उसके व्यवहार से, संस्कार से, उसकी “मर्यादा” से, लेकिन कभी उसके विचारों से नहीं आज भी अगर कोई औरत सामने आती है  चाहे वह पढ़ी-लिखी हो, आत्मनिर्भर हो, या आम जीवन जी रही हो तो समाज की पहली नज़र उसके कपड़ों पर पड़ती है, उसके चेहरे, उसके शरीर पर जाती है ना कि उसकी आँखों में छिपे सपनों पर, उसकी बातों में छुपे अनुभवों पर, या उसके विचारों की उड़ान पर।

समाज ने हमेशा औरत की आत्मा को अनदेखा किया है। उसे एक इंसान से पहले एक “स्त्री” के रूप में देखा गया है, और वो भी एक ऐसे चश्मे से जिसमें सिर्फ उसकी “शरीरिक छवि” को अहमियत दी जाती है।

आधी आबादी, अधूरी ज़िंदगी:

औरतें इस दुनिया की आधी आबादी हैं, पर क्या उन्हें आधे अधिकार भी हासिल हैं? क्यों आज भी एक स्त्री को बार-बार खुद को साबित करना पड़ता है, कि वह सोच सकती है, बना सकती है, चुन सकती है?

वर्जिनिया वुल्फ़ ने कहा था, “एक औरत को लेखिका बनने के लिए अपना कमरा चाहिए।” वह कमरा केवल दीवारों से नहीं, स्वतंत्रता से बनता है विचारों की, इच्छाओं की, अस्तित्व की। आज भी न जाने कितनी स्त्रियाँ उस कमरे की तलाश में भटक रही हैं।

महिलाओं ने जब भी किसी क्षेत्र में कुछ करने की कोशिश की है, तो उन्हें हमेशा रोका गया है। चाहे वह राजनीति हो, खेल  हो, साहित्य हो या कोई और काम। यहाँ मैं एक मशहूर लेखिका जेन ऑस्टिन का उदाहरण देना चाहूंगी। जेन ऑस्टिन ब्रिटेन की रहने वाली थीं और बहुत ही प्रतिभाशाली लेखिका थीं। उनका पहला उपन्यास सेंस एंड सेंसिबिलिटी (Sense & Sensibility) था, जो 1811 में छपा। लेकिन इसे छपवाना आसान नहीं था। सिर्फ इसलिए कि जेन एक महिला थीं, उनका नाम किताब पर नहीं छापा गया। उसकी जगह लिखा गया, “Written by a Lady”। उनकी दूसरी किताब प्राइड एंड प्रेजूडिस (Pride & Prejudice) उन्होंने 1796-97 में लिखी थी, लेकिन यह 1813 में छप सकी। यानी करीब 16 साल बाद।

इन उदाहरणों से साफ़ होता है कि महिलाओं को अपनी पहचान बनाने के लिए कितनी मुश्किलों और रुकावटों का सामना करना पड़ा। सिर्फ इसलिए कि वे महिलाएं थीं।

अकेली औरत, समाज की सबसे बड़ी चुनौती:

जिस समाज ने स्त्री को देवी की संज्ञा दी,पूजा के योग्य माना, उसी समाज ने उसके पंख भी कतर दिए। उसे कहा गया, तुम महान हो,” लेकिन साथ में ये भी तय कर दिया गया कि तुम्हारी महानता सीमाओं में बंद रहेगी।

स्त्री को आदर्श तब तक माना गया जब तक वो चुप रही, किसी की माँ, पत्नी, बहू या बेटी बनकर अपना अस्तित्व भूलती रही।लेकिन जैसे ही वह इन रिश्तों की परिभाषा से बाहर निकलती है,खासकर जब वह अकेली होती है,तो वह समाज की नजर में “संदिग्ध”, “असामान्य”, और यहाँ तक कि खतरनाक बन जाती है।

एक अविवाहित स्त्री अगर अपनी शर्तों पर जी रही है, तो उससे पूछा जाता है,“शादी क्यों नहीं की?”, “कोई दिक्कत है क्या?”, या फिर सीधा सीधा मान लिया जाता है कि उसमें ही कोई कमी होगी। और अगर उसने विवाह तोड़ दिया, तो उसे तुरंत “कुलच्छिनी”, “घमंडी”, “अहंकारी”, या “संस्कारहीन” करार दे दिया जाता है। समाज उसे यह समझने का मौका ही नहीं देता कि उसने खुद को बचाने के लिए रिश्ता छोड़ा हो सकता है, ना कि तोड़ने के लिए।

क्यों डरता है समाज एक अकेली औरत से?

क्योंकि वह किसी की “परिभाषा” में नहीं आती। उसे कंट्रोल नहीं किया जा सकता। वह अपने फैसले खुद लेती है, किसी से अनुमति नहीं मांगती, किसी की छाया में जीने से इनकार करती है। ऐसी औरत समाज के बनाए हर नियम को चुनौती देती है, कि औरत को हमेशा किसी के साथ होना चाहिए, किसी के अधीन होना चाहिए। एक अकेली औरत वह आईना बन जाती है जिसमें समाज अपने पूर्वाग्रह, भय, और पाखंड को साफ-साफ देख सकता है, और यही उसे असहज कर देता है।

जब औरत कलम उठाती है:

तसलीमा नसरीन, इस्मत चुगताई, अमृता प्रीतम, ये वे नाम हैं जिन्होंने अपने शब्दों से पितृसत्ता की नींव हिला दी। इन्होंने चुप्पी तोड़ी, सवाल किए, अपने अनुभवों को बिना संकोच बाँटा। और नतीजा? समाज ने उन्हें बदचलन, बाग़ी और बेहया कहकर नकारा। पर क्या सच्चाई कहना गुनाह है?

तस्लीमा नसरीन एक बहादुर बांग्लादेशी लेखिका थीं। उन्हें बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ा, क्योंकि उनके विचारों की वजह से उन्हें उनके ही देश से बाहर निकाल दिया गया। उनकी किताबों को छापने की इजाजत नहीं दी जाती थी।

तस्लीमा नसरीन ने एक बार कहा था, “औरतों का कोई अपना देश नहीं होता।” यह बात उन्होंने पितृसत्ता के खिलाफ अपनी किताब में लिखी थी। उन्होंने इस किताब में महिलाओं के हक़ में खुलकर लिखा और उनकी समस्याओं को सामने रखा।

इस किताब के एक लेख का नाम है, “पुरुषों को मिलते हैं अधिकार, औरतों पर होती है जिम्मेदारियाँ।” इसमें तस्लीमा लिखती हैं “सदियों तक लोगों को यह समझ ही नहीं आया कि एक औरत, माँ होने के साथ-साथ एक इंसान भी होती है। हमेशा औरत को एक छोटी और कमज़ोर इंसान के तौर पर देखा गया, उसे कभी बराबरी का दर्जा नहीं दिया गया।”

तस्लीमा यह भी कहती हैं कि औरतें सिर्फ भारत में नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। अपनी एक और रचना “लेट गल्स बी बॉयज़” में वो कहती हैं, “यह दुनिया मर्दों की है। इस दुनिया में कोई और चीज़, कोई भी प्राणी औरत जितना असुरक्षित नहीं है।”

21वीं सदी की विडंबना:

जब एक लड़की आत्मविश्वास के साथ अपनी राय रखती है, अपने मन की बात कहती है, अपनी पसंद नापसंद जाहिर करती है, तो समाज उसे “अटेंशन सीकर” करार देता है। उसे ऐसा दिखाने की कोशिश की जाती है जैसे वह बस सबका ध्यान खींचने के लिए ये सब कर रही हो, न कि अपने वजूद को जीने के लिए।

लेकिन जब वही लड़की चुप रहना पसंद करे, अपनी बातों को अंदर ही अंदर घुटने दे, तो समाज उस पर “कमज़ोर”, “दबी-कुचली”, “असभ्य” जैसे तमगे लगा देता है। यानी किसी भी हालत में दोष उसी का है, बोलो तो भी गुनहगार, चुप रहो तो भी।यहाँ सवाल सिर्फ़ उसके व्यवहार का नहीं, बल्कि उस सोच का है जो हर महिला को किसी न किसी खांचे में बाँधकर देखना चाहता है।

ये दौर स्मार्टफोन और सोशल मीडिया का है, जहाँ ‘फेमिनिज़्म’ जैसे शब्द ट्रेंड करते हैं, जहाँ महिला सशक्तिकरण की बातें मंचों और घोषणाओं पर खूब होती हैं। पर सच्चाई यह है कि यह सब कहीं न कहीं “आधुनिकता का मुखौटा” है, जो बस चेहरे पर चढ़ा लिया गया है। जैसे ही कोई औरत खुलकर हँसती है, उसे ‘बेशर्म’ कहा जाता है। उसके कपड़ों से लेकर उसके हाव भाव तक पर सवाल उठाए जाते हैं।

और जब वही औरत रोती है, किसी दर्द से, किसी पीड़ा से तो उसे या तो ड्रामा करार दिया जाता है, या कहा जाता है, “इतनी ही कमज़ोर है तो बाहर क्यों निकली?” यानी न उसकी ख़ुशी स्वीकार है, न उसका ग़म।

औरत को समाज से चाहिए क्या?

उसे दया नहीं चाहिए, क्योंकि दया तो कमज़ोरों पर की जाती है। और औरत कोई बेबस या निरीह प्राणी नहीं है। उसे किसी की करुणा की नहीं, बराबरी की ज़रूरत है।

बराबरी, जो उसकी काबिलियत, सोच और हक़ को उसी तरह मान्यता दे, जैसे किसी पुरुष को दी जाती है। औरत को बराबर की जगह चाहिए घर में, समाज में, और हर उस जगह जहाँ फ़ैसले लिए जाते हैं।

समाज अक्सर कहता है, “हम औरतों की सुरक्षा करना चाहते हैं।” लेकिन यह सुरक्षा एक सीमित दायरे की तरह पेश की जाती है, जहाँ औरत को आज़ादी नहीं बल्कि निगरानी दी जाती है। हर समय यह कहा जाता है कि “तुम बाहर मत जाओ”, “ऐसे कपड़े मत पहनो”, “रात को मत निकलो” यह कैसी सुरक्षा है जिसमें साँस लेने की भी इजाज़त नहीं?

औरत को सुरक्षा के नाम पर बनाई गई चारदीवारी नहीं चाहिए, उसे खुले आसमान में उड़ने की आज़ादी चाहिए। वह खुद तय करना चाहती है कि कहाँ जाना है, कैसे जीना है, क्या पहनना है। वह सुरक्षा नहीं, वो हक़ मांगती है जो उसका जन्मसिद्ध अधिकार है।

औरत को अक्सर नाज़ुक कहकर एक सजावटी फूल की तरह पेश किया जाता है, जिसे टूटने से बचाना है, छूने से पहले इजाज़त लेनी है, और हरदम एक काँच के गुलदस्ते में रख देना है। लेकिन असल में वह फूल नहीं, एक ज्वाला है। एक ऐसी आग, जो ज्ञान भी दे सकती है, और अन्याय के ख़िलाफ़ जल भी सकती है। एक ऐसी ताक़त, जो परिवार को भी संवारती है, और ज़रूरत पड़ने पर समाज को भी आईना दिखा सकती है

मासिक धर्म पर एक दिन की छुट्टी , एक छोटा फैसला, बड़ी बहस

 

मासिक धर्म पर एक दिन की छुट्टी , एक छोटा फैसला, बड़ी बहस

हाल ही में एलएंडटी (L&T) के चेयरमैन ने एक बड़ा और प्रगतिशील फैसला लिया महिलाओं को मासिक धर्म (पीरियड्स) के लिए हर महीने एक दिन की छुट्टी देने का। यह फैसला जितना सहानुभूति और समझदारी से भरा था, उतना ही इस पर विवाद भी हुआ। खबर आते ही सोशल मीडिया पर जैसे तूफान आ गया। कुछ लोगों ने इसे सराहा, तो कई लोग सवाल उठाने लगे कि  “पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य का क्या?”, “पुरुष तो ज्यादा काम करते हैं, उन्हें छुट्टी क्यों नहीं?” फिर तो महिलाएं आसानी से प्रमोशन भी पा लेंगी! लेकिन क्या कभी हमने सोचा है कि महिलाएं हर महीने कितनी तकलीफ से गुजरती हैं?

मैं खुद एक महिला हूं और पिछले 13 सालों से हर महीने मासिक धर्म के उस चक्र से गुजर रही हूं, जो न सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी थका देने वाला होता है। ये सिर्फ चार–पांच दिन खून बहने की बात नहीं है। दर्द, चिड़चिड़ापन, थकावट, मूड स्विंग्स, और कभी-कभी बिना किसी वजह के बेचैनी, ये सब कुछ कई बार पीरियड्स से एक हफ्ता पहले ही शुरू हो जाते हैं। हर महीने शरीर खुद को तोड़कर फिर से जोड़ता है। पेट के नीचे का वह ऐंठन भरा दर्द, पीठ में भारीपन, पैरों में झनझनाहट, और कभी-कभी सिर में इतना तेज़ दर्द कि कुछ सोचने की ताकत तक नहीं बचती। लेकिन फिर भी, हमसे उम्मीद की जाती है कि हम स्कूल जाएं, ऑफिस का काम समय पर करें, घर संभालें, मुस्कराएं, और कभी शिकायत भी न करें।

ना स्कूलों में छुट्टी मिलती है, ना दफ्तरों में कोई सहानुभूति। अगर हम दर्द की बात करें, तो लोग कहते हैं, “ये तो नॉर्मल है, सबको होता है।” लेकिन कोई ये नहीं समझता कि हर शरीर अलग होता है, और हर किसी का अनुभव अलग। कुछ के लिए ये दर्द इतना असहनीय होता है कि बिस्तर से उठना भी मुश्किल हो जाता है। फिर भी हम काम पर जाते हैं, मीटिंग्स अटेंड करते हैं, पढ़ाई करते हैं, और दिनभर खुद को संयम में रखते हैं ताकि कोई ये न कहे कि “वो तो पीरियड्स पर है, इसलिए मूड खराब है।”

ये सिर्फ खून बहने की बात नहीं है। ये हमारी सहनशीलता की परीक्षा है हर महीने। फिर भी हम लड़कियां और महिलाएं इसे अपनी जिंदगी का हिस्सा मानकर चुपचाप सहती रहती हैं, बिना शिकायत के। क्योंकि हम जानती हैं कि अगर हमने आवाज़ उठाई, तो शायद हमें ‘कमज़ोर’ कह दिया जाएगा।

बचपन में मुझे PMS (प्री-मेंस्ट्रुअल सिंड्रोम), का मतलब तक नहीं पता था। अचानक चिड़चिड़ापन क्यों होता है, मूड क्यों खराब हो जाता है, शरीर इतना थका-थका क्यों महसूस करता है, इन सवालों का कोई जवाब नहीं था। बस यही समझाया गया कि “ये सब नॉर्मल है, होता है लड़कियों को।”

हमारे स्कूलों में इस विषय पर ना के बराबर जानकारी दी जाती है। जो कुछ भी बताया जाता है, वो बस बायोलॉजी की किताबों में सूखी भाषा में होता है, क्लिनिकल, भावनाओं से रहित। हमें कभी नहीं सिखाया गया कि PMS भी एक असली, वैज्ञानिक रूप से सिद्ध मानसिक और शारीरिक स्थिति है, जिसमें हार्मोनल बदलावों की वजह से लड़कियां और महिलाएं इमोशनली और फिजिकली परेशान हो सकती हैं।

समाज में भी इस पर बात करना जैसे एक ‘गुनाह’ हो। जैसे मासिक धर्म कोई बीमारी या शर्म की बात हो। अगर किसी ने पीरियड्स या PMS पर बात की, तो उसे चुप करा दिया जाता है, “छोटे बच्चे बैठे हैं”, “ये सब बातों को घर के अंदर ही रखना चाहिए”, “ऐसी बातें सार्वजनिक रूप से नहीं की जातीं”। पर सवाल ये है क्यों नहीं? क्यों हमें अपने ही शरीर के बारे में चुप रहना सिखाया जाता है? क्यों एक नैचुरल बायोलॉजिकल प्रोसेस को ‘गंदा’, ‘शर्मनाक’ या ‘छुपाने लायक’ बना दिया गया है?

अगर बचपन से हमें PMS और पीरियड्स के बारे में खुलकर बताया जाता, तो शायद हम अपने शरीर के साथ ज्यादा जुड़ाव महसूस करते। शायद हम खुद को दोषी या ‘कमज़ोर’ नहीं समझते जब PMS के चलते रोने का मन करता या गुस्सा आ जाता। शायद लड़के भी इसे समझते और संवेदनशील बनते, ना कि मज़ाक उड़ाते। यह कोई बहाना नहीं है, ये एक रियलिटी है, जिससे हर महीने लाखों लड़कियां और महिलाएं गुजरती हैं। हमें चाहिए कि हम इस पर बात करें, खुलकर, बिना शर्म के। ताकि अगली पीढ़ी की लड़कियों को वो अकेलापन ना महसूस हो जो हमने किया।

आजकल “फेमिनिज्म” शब्द को इस तरह पेश किया जाने लगा है, जैसे ये कोई खतरनाक विचारधारा हो। जैसे अगर महिलाएं अपने हक की बात करें, बराबरी की मांग करें, तो समाज की नींव हिल जाएगी। उन्हें ‘संस्कृति के खिलाफ’, ‘परिवार-विरोधी’ या ‘अत्यधिक बोल्ड’ तक कह दिया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि फेमिनिज़्म का मतलब है, समानता। अधिकारों की समानता, अवसरों की समानता, और इज्ज़त की समानता।

फेमिनिज़्म का मतलब पुरुषों से नफरत करना नहीं है, बल्कि उस सोच से लड़ना है जो महिलाओं को हमेशा “कम” समझती आई है। यह उस सिस्टम पर सवाल उठाना है जिसमें लड़की चाहे जितनी पढ़ी-लिखी हो, चाहे वह खुद कमाकर अपना और अपने परिवार का खर्चा उठा रही हो, फिर भी उस पर यह ‘कर्तव्य’ थोप दिया जाता है कि घर के सारे काम उसी की ज़िम्मेदारी हैं। एक कामकाजी महिला सुबह ऑफिस जाती है, दिनभर टारगेट्स पूरे करती है, मीटिंग्स में भाग लेती है, अपनी पहचान बनाती है। लेकिन जब वो शाम को थकी हारी घर लौटती है, तो उससे उम्मीद की जाती है कि वो खाना भी बनाए, बच्चों का होमवर्क भी देखे, घर की सफाई भी करे, और साथ ही मुस्कराती भी रहे। ये दोहरी जिम्मेदारी सिर्फ इसलिए क्योंकि वो एक औरत है।

पढ़ी लिखी और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिलाएं भी घरेलू बराबरी से वंचित हैं। उनसे ये उम्मीद की जाती है कि वो अपने करियर को “बैलेंस” करें, लेकिन उसी वक्त उनके पुरुष साथियों को ऐसा कोई दबाव नहीं झेलना पड़ता। अगर कोई महिला कह दे कि “मैं अकेले सब कुछ नहीं कर सकती,” तो लोग कहते हैं, “फिर शादी क्यों की?” या “ये तो फेमिनिस्ट हो गई है।” समाज में अब भी ये धारणा है कि एक ‘अच्छी’ औरत वो होती है जो बिना शिकायत सब कुछ सहती है, जो खुद को सबसे आखिरी में रखती है। लेकिन क्या हम ये सवाल नहीं कर सकते कि एक औरत का ‘अच्छा’ होना उसकी खुशी और संतुलन से क्यों नहीं मापा जाता?

फेमिनिज़्म को बदनाम करने की ये कोशिशें इसलिए होती हैं क्योंकि बराबरी से सबसे ज़्यादा डर उन्हें लगता है जो हमेशा से अपने विशेषाधिकारों को ही ‘नॉर्मल’ मानते आए हैं। लेकिन अब वक्त है कि हम इस डर को तोड़ें। महिलाओं को ना सिर्फ घर में, बल्कि हर जगह ऑफिस, समाज, और रिश्तों में बराबरी का हक मिले।

जो लोग कहते हैं कि “यह फैसला गलत है,” कि महिलाओं को पीरियड्स में छुट्टी देना या उनके दर्द को गंभीरता से लेना समाज को “कमज़ोर” बना देगा, उनसे बस एक सवाल है, जब आपकी माँ, बहन या पत्नी पीरियड्स के दौरान दर्द में तड़प रही थीं, क्या आपने उन्हें कभी सच में आराम करने दिया? क्या आपने उनके हिस्से के काम खुद करने की कोशिश की?

कई बार हम अपने सबसे क़रीबी रिश्तों में भी यह समझ नहीं पाते कि एक औरत किस दर्द से गुजर रही है। पेट में मरोड़, कमर में जकड़न, पैरों में थकान, और मन में एक अनजानी बेचैनी, ये सब कुछ वो हर महीने झेलती हैं, और फिर भी मुस्कुराते हुए अपने सारे कर्तव्य निभाती हैं। क्योंकि उन्हें सिखाया गया है कि दर्द को छुपाना ही ‘सशक्त महिला’ की पहचान है।

लेकिन अब वक्त आ गया है कि हम ये समझें महिलाओं का दर्द सिर्फ निजी नहीं है, यह एक सामाजिक मुद्दा है। जब एक महिला ऑफिस में दर्द के बावजूद काम करती है, जब एक स्कूल जाने वाली लड़की पीरियड्स के दौरान असहज महसूस करते हुए भी क्लास में बैठती है, या जब एक माँ घर के सारे काम पीरियड्स के समय भी वैसे ही करती है जैसे किसी और दिन, तब ये सिर्फ उनका व्यक्तिगत संघर्ष नहीं होता, बल्कि हमारी सामूहिक असंवेदनशीलता का प्रमाण होता है। हमारा समाज तब तक प्रगतिशील नहीं कहा जा सकता, जब तक वो महिलाओं के दर्द को ‘अदृश्य’ मानता रहेगा। छुट्टी देना या सहानुभूति दिखाना कोई ‘विशेष सुविधा’ नहीं है, ये एक मानवीय ज़रूरत है। ये सम्मान है उस संघर्ष का, जो महिलाएं हर महीने झेलती हैं बिना किसी शिकायत के।

तो अगली बार जब कोई कहे कि “ये फेमिनिज्म बहुत बढ़ गया है” या “हर चीज़ के लिए विशेष सुविधा क्यों चाहिए,” तो बस इतना पूछिए—”जब आपकी माँ दर्द में थीं, तब आपने क्या किया?” अगर जवाब में कुछ सोचने की ख़ामोशी हो, तो समझिए बात गलत नहीं, सोच अधूरी है। और इस सोच को बदलना अब ज़रूरी है।

हम यह नहीं कह रहे कि पुरुषों की समस्याएँ नहीं हैं। लेकिन जब भी महिलाओं के लिए कोई अच्छा फैसला होता है, तब पुरुषों की तकलीफ़ क्यों सामने लाई जाती है?

सच तो यह है कि जब महिलाएं अपनी बात कहती हैं, अपने लिए खड़ी होती हैं, तो समाज को वह मंजूर नहीं होता। लेकिन अब वक्त बदल रहा है। हम चुप नहीं बैठेंगे। यह छुट्टी कोई स्पेशल ट्रीटमेंट नहीं है, यह एक जरूरी सुविधा है। यह फैसला समाज में बराबरी की तरफ एक छोटा लेकिन अहम कदम है।

मराठा कौन हैं? एक जाति नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक विचारधारा

 

मराठा कौन हैं? एक जाति नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक विचारधारा

जब भी ‘मराठा’ शब्द कानों में पड़ता है, मन में एक तेजस्वी इतिहास की छवि उभर आती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह मराठा शब्द आया कहां से? क्या ये बस एक जाति है? या फिर एक बड़ी सांस्कृतिक पहचान?

मराठा समाज को लेकर आम तौर पर यही समझ होती है कि यह एक जाति है, लेकिन अगर हम इतिहास में गहराई से जाएं, तो ‘मराठा’ एक भाषा, एक संस्कृति और सबसे बढ़कर एक समावेशी सोच का प्रतीक है। आइए जानते हैं इस शब्द की ऐतिहासिक यात्रा और सामाजिक महत्व।

मराठा, भाषा से समाज बनने की कहानी:

करीब 2700 साल पहले महाराष्ट्र में एक भाषा विकसित होने लगी—जिसे लोग ‘मरहट्टी’ कहने लगे। यह कोई एक जैसी नहीं थी, बल्कि हर प्रांत में उसकी एक अलग बोली थी वऱ्हाडी, कोकणी, गोंडी, अहिराणी, घाटी जैसी। यही ‘मरहट्टी’ धीरे-धीरे ‘मराठी’ बन गई, और इस भाषा को बोलने वाला समाज बना ‘मराठा’।

ये लोग कृषि से जुड़े थे, खेतों में मेहनत करते थे, समाज का निर्माण करते थे। महाराष्ट्र शब्द भी इन्हीं से निकला, ‘महारट्टा’ से ‘महाराष्ट्र’ बना।

जाति नहीं, पेशा था पहचान:

7वीं सदी में महाराष्ट्र में जाति व्यवस्था नहीं थी। लोग काम के आधार पर पहचाने जाते थे—जैसे जो खेती करता वह कुनबी, तेल निकालता वह तेली, माटी से बर्तन बनाता वह कुंभार। लेकिन 10वीं सदी तक यह व्यवस्था जातियों में बदल गई और मराठा समाज में कई उपजातियाँ बनीं, मराठा कुनबी, मराठा माली, मराठा तेली, मराठा धनगर, मराठा महार वगैरह।

मराठा समाज कोई एक जाति नहीं, बल्कि एक साझा सोच का नाम था। जब छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिंदवी स्वराज्य की नींव रखी, तब उन्होंने हर जाति, धर्म और भाषा के लोगों को इसमें जगह दी। मराठा उनके लिए सिर्फ एक जाति नहीं, बल्कि एक विचार था, स्वराज्य का, आत्मसम्मान का, जनता के राज्य का।

शाहजी भोंसले, मराठा शाही के वास्तुकार:

शिवाजी महाराज के पिता शाहजी भोंसले, एक बहुभाषी, शूरवीर, और दूरदर्शी राजा थे। उन्हें 35 भाषाओं का ज्ञान था, उनके दरबार में 80 से अधिक पंडित थे। उन्होंने मराठा संस्कृति को कर्नाटक तक फैलाया। आज तंजावुर में जो मराठा कला और साहित्य दिखता है, वह उनकी ही देन है।

जब शाहजी भोंसले को कर्नाटक में जागीर दी गई, तो उन्होंने इस क्षेत्र को सिर्फ राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं देखा, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी समृद्ध किया। उन्होंने स्थानीय कला, संगीत और साहित्य को प्रोत्साहित किया। उनके शासनकाल के दौरान मराठा और द्रविड़ीय संस्कृतियों का अनूठा संगम देखने को मिला। तंजावुर के मराठा साहित्य और कला के स्वरूप पर उनका गहरा प्रभाव है, और इसे उनकी दूरदृष्टि का प्रमाण माना जाता है।

शाहजी भोंसले एक धर्मनिष्ठ व्यक्ति थे। उनके शासनकाल में धर्म और संस्कृति का संरक्षण किया गया। उन्होंने विद्वानों और कलाकारों को दरबार में स्थान दिया और धर्मनिरपेक्षता की भावना को बढ़ावा दिया। वे यह सुनिश्चित करते थे कि उनके अधीनस्थ विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों का सम्मान करें।
शाहजी भोंसले का योगदान भारतीय इतिहास में अमिट है। उनकी बहुभाषीय क्षमता, सांस्कृतिक योगदान और सैन्य रणनीति ने उन्हें एक ऐसा व्यक्तित्व बनाया, जिसकी प्रेरणा आज भी लोग लेते हैं।

छत्रपति शिवाजी महाराज, हर भारतीय के राजा:

शिवाजी महाराज का स्वराज्य किसी जाति का नहीं, सबका था। उनके दरबार में मुसलमान, ईसाई, आदिवासी—सभी को स्थान मिला। उन्होंने कभी धर्म या भाषा के आधार पर भेदभाव नहीं किया। इसलिए ‘जय भवानी, जय शिवाजी’ कहना है तो सबको साथ लेकर चलना होगा, किसी को डराकर नहीं।

उनकी सेना में भी विभिन्न धर्मों और जातियों के लोग शामिल थे। उदाहरण के लिए, उनके नौसेना प्रमुख सिद्दी संबल मुसलमान थे। यह दिखाता है कि शिवाजी महाराज ने हमेशा योग्यता को प्राथमिकता दी, न कि किसी के धर्म या जाति को। शिवाजी महाराज ने कभी भी किसी धर्म के खिलाफ भेदभाव नहीं किया। उन्होंने मस्जिदों और चर्चों की रक्षा की और यह सुनिश्चित किया कि उनके शासन में हर धर्म के लोग सुरक्षित महसूस करें। उनके लिए धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय था, और उन्होंने इसे राजनीति से अलग रखा।

शिवाजी महाराज की विरासत आज भी हमें प्रेरित करती है। उन्होंने यह साबित किया कि एक सच्चा नेता वही होता है जो सभी को साथ लेकर चले और न्याय और समानता के सिद्धांतों पर शासन करे।
उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि अगर हम एकजुट होकर काम करें, तो हम किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं।

बॉडी शेमिंग क्या है? खूबसूरती की परख या समाज की एक और कड़वी सच्चाई?

 

बॉडी शेमिंग क्या है? खूबसूरती की परख या समाज की एक और कड़वी सच्चाई?

क्या आपने कभी सोचा है , आप जैसा महसूस करते हैं, वैसा ही दिखने लगते हैं? और जैसा दिखने लगते हैं, वैसा ही समाज आपको ट्रीट करता है। लेकिन रुकिए! आपकी बॉडी कोई जोक नहीं है, और आपकी मेंटल हेल्थ किसी की “परख” का टूल नहीं। इसलिए अब वक्त है सवाल पूछने का।बॉडी शेमिंग, क्या ये खूबसूरती की परिभाषा है या फिर समाज की सबसे बदसूरत सोच?

बॉडी शेमिंग की शुरुआत कहां से होती है?

बॉडी शेमिंग यानी किसी के शरीर को लेकर उसका मज़ाक उड़ाना, शर्मिंदा करना या ताने मारना। हैरानी की बात ये है कि इसकी शुरुआत अक्सर हमारे घर से ही होती है। बचपन में ही बच्चों को उनके रंग, वजन या कद को लेकर परिवार के लोग बातें सुनाने लगते हैं। ये बातें धीरे-धीरे उनके आत्मविश्वास को खत्म कर देती हैं।

स्कूल, कॉलेज और सोशल मीडिया तक फैला ज़हर:

स्कूल और कॉलेज में बच्चों को उनके शरीर के आधार पर नाम दे दिए जाते हैं जैसे,”मोटी”, “छोटू”, “लंबी गगरी”, आदि। यह मानसिक रैगिंग का रूप है, जिसे हम हल्के में ले लेते हैं। आज सोशल मीडिया जैसे इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब पर भी यह ट्रेंड तेजी से बढ़ा है। अनंत अंबानी की शादी के वीडियो पर हुए बॉडी शेमिंग वाले कमेंट्स इसका ताजा उदाहरण हैं।

टीवी शोज़, रियलिटी प्रोग्राम्स और विज्ञापनों में अक्सर किसी के शरीर को लेकर जोक्स बनाए जाते हैं। ‘द कपिल शर्मा शो’ जैसे कार्यक्रमों में महिला कलाकारों पर फिजिकल कमेंट्स करके दर्शकों को हंसाया जाता है। ये सब हमारे समाज की सोच को दर्शाता है और बॉडी शेमिंग को “सामान्य” बना देता है।

लड़कियों पर क्यों पड़ता है बॉडी शेमिंग का ज़्यादा असर:

हालांकि बॉडी शेमिंग लड़के और लड़कियों दोनों के साथ हो सकती है, लेकिन इसका सबसे बड़ा असर लड़कियों पर होता है। समाज लड़कियों की खूबसूरती को उनकी पहचान बना देता है।
“सांवली हो? शादी में दिक्कत आएगी।”
“मोटी हो? वजन कम करो।”
“दुबली हो? क्या खाती ही नहीं?”

इस तरह की बातें उन्हें बार-बार शर्मिंदा करती हैं और मानसिक तनाव का कारण बनती हैं।

खूबसूरती का असली मतलब क्या है?

खूबसूरती सिर्फ गोरे रंग या पतली कमर में नहीं होती। आत्मविश्वास, आत्म-सम्मान और व्यवहार ही इंसान को खूबसूरत बनाता है। समाज को यह समझना होगा कि शरीर की बनावट किसी की योग्यता नहीं तय करती।

स्कूल, कॉलेज और वर्कप्लेस में बॉडी शेमिंग को उतनी ही गंभीरता से लेना चाहिए जितना कि रैगिंग को। इसके लिए कड़े नियम और सख्त सजा की ज़रूरत है। साथ ही, पेरेंट्स और मीडिया को भी अपनी सोच में बदलाव लाना होगा।

बदलाव की शुरुआत घर से करें:

बॉडी शेमिंग एक मानसिक हिंसा है जिसे मज़ाक समझा जाता है। अब समय आ गया है कि हम इस सोच को जड़ से खत्म करें। अपने बच्चों को सिखाएं कि हर शरीर खूबसूरत है और हर व्यक्ति सम्मान के लायक।

हमें यह समझना होगा कि हर इंसान सम्मान के लायक है ,चाहे उसका शरीर समाज के “मापदंडों” पर खरा उतरे या नहीं।
खूबसूरती का कोई तय पैमाना नहीं होता। जो समाज ने बना रखा है, वो गलत है। असली खूबसूरती वो होती है जो आत्मा और सोच में हो। चलो, अब इस मानसिक हिंसा को मज़ाक समझना बंद करें। खुद को और दूसरों को स्वीकार करना सीखें , क्योंकि हर शरीर की अपनी कहानी होती है। और हर कहानी खूबसूरत होती है।

क्या डिजिटल इंडिया से बाहर हैं महिलाएं?

 

क्या डिजिटल इंडिया से बाहर हैं महिलाएं?

मोहल्ले के लोग बातें बनाते हैं “ लड़की हो फ़ोन क्या करोगी, भाई के फ़ोन से काम कर लो उसको ज्यादा जरुरत होती है।” “लड़की लोग को ज्यादा फोन वोन नहीं देते नहीं तो हाथ से निकल जायेगी।”  “ई लड़किया सब फोनवा को हमेशा हाथवा में  काहें लेके घुमती है,  ना जाने परसवा में रख लेगी तो कौन सा  खजनवा गिराए जाई।”

ऐसे वाक्य अक्सर घर, गली और नुकड़ों पर  सुनने को मिलते हैं। घर हो या बाहर, लड़कियों को फ़ोन और इंटरनेट से दूर रखने की मानसिकता आम है। समाज को तो शायद यहीं लगता है कि अगर वो महिलाओं को फोन और इंटरनेट से दूर रखेंगे तभी उनकी आधी से ज्यादा समस्याएं खत्म हो पायेंगी। लेकिन क्या यह सोच डिजिटल इंडिया के सपने को साकार करने में बाधा नहीं बन रही?

डिजिटल इंडिया का सपना और हकीकत:
भारत सरकार के डिजिटल इंडिया अभियान का उद्देश्य था “Power To Empower”, यानी हर नागरिक को डिजिटल माध्यम से सशक्त बनाना। इसके तहत ब्रॉडबैंड हाईवे, मोबाइल कनेक्टिविटी और सूचना तक सार्वभौमिक पहुंच जैसे स्तंभ शामिल हैं। लेकिन क्या यह पहल सही मायनों में सभी तक पहुंच रही है?, जवाब है नहीं जब कई ग्रामिण क्षेत्रों और गिरीब तबकों तक डिजीटल होने का जरिया ही उपलब्ध नहीं है तब कैसे डिजीटल होगा।

कहाँ है डिजिटल होने का जरिया
कॉलेज में पढ़ रहे हजारों बच्चे जिनके पास फीस के पैसे नहीं, वो स्मार्ट फ़ोन कैसे अफोर्ड कर सकते है। रूरल एरियाज में तो यह समस्या और बड़े स्तर पर है। जहां लाइट ही नहीं आती है 12 से 14 घंटे तो वहां के बच्चे अपने घर और कॉलेज के काम ऑनलाइन कैसे कर सकते हैं। ज्यादातर परिवारों में एक स्मार्ट फोन है या छोटा कीपैड फोन लेकिन सिर्फ़ खेत पर जाने वाले बाबा या शहर को आए पापा के पास और कहीं पर तो वह भी नहीं।

हमने कोविड के दौरान देखा है कि जब बच्चे ऑनलाइन मोड में एग्जाम दे रहे थे। नेटवर्क की समस्या के कारण उनके एग्जाम्स तो छूटे ही छूटे कई बच्चों का ईयर ड्रॉप भी हो गया। तब ये समस्या थी समझ आता है लेकिन अब क्या ये नहीं हो रहा है? हो रहा है बल्कि हालात बद से बद्तर हो गए है। जहां एक तरफ बच्चे वापस कॉलेज और क्लासेज की ओर रुख़ कर रहें है। कैंपस में आकर टाइम से क्लास करना चाहते है तो उन्हें उस टाइम पे क्लास ना मिलकर दोस्तों से पता चलता है। अरे! यार क्लास तो नहीं हैं सर ने व्हाटसप किया है 1 घंटे बाद लेंगे। तुम्हारे पास तो ये छोटा फ़ोन है इसमें कैसे चलाओगी और पीडीएफ भी तो पढ़ने होते हैं।

महिलाओं की डिजिटल भागीदारी:

डिजिटल इंडिया के सफर में महिलाओं की भागीदारी अभी भी सीमित है। आंकड़ों के अनुसार, महिलाओं के पास फोन या लैपटॉप की उपलब्धता पुरुषों के मुकाबले आधी भी नहीं है। अगर किसी लड़की को फोन मिलता भी है, तो उसकी प्राइवेसी पर सवाल उठाए जाते हैं। महिलाओं के लिए डिजिटल साधनों की कमी को समझना जरूरी है। आज के दौर में इंटरनेट शिक्षा, रोजगार, और विकास का अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन महिलाओं के पास इन संसाधनों की कमी है। यही वजह है कि डिजिटल इंडिया की पहल महिलाओं तक पूरी तरह से पहुंचने में विफल हो रही है। महिलाओं को अगर तकनीकी सशक्तिकरण की दिशा में कदम बढ़ाना है, तो उन्हें पहले डिजिटल साधनों की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी।

डिजिटल सशक्तिकरण के लिए ज़रूरी है कि सभी महिलाओं को समान अवसर दिया जाए। न केवल तकनीक की उपलब्धता सुनिश्चित हो, बल्कि समाज में यह सोच भी बदले कि महिलाएं भी डिजिटल दुनिया में बराबर की हिस्सेदारी निभा सकती हैं। भारत में डिजिटल इंडिया का सपना तभी साकार होगा जब महिलाएं भी पूरी तरह से इसका हिस्सा बनेंगी।

उर्दू के मश्हूर शायर’ कैफ़ी आज़मी’ ने तो 1995 में अपनी निजी सम्पत्ति से मिजवा गांव फूलपुर जिले में 10 कंप्युटर अपने ही कॉलेज में रखवाये जो मैट्रिक तक था और साथ ही जनरेटर भी लगवाया। जिससे लाइट जाने पर बच्चों को दिक्कत न हो। ऐसे ही यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लैपटॉप वितरण योजना शुरू की थी, जिससे छात्रों को इंटरनेट की सुविधा मिली। वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस दिशा में कदम उठाए हैं। लेकिन इन योजनाओं को और प्रभावी बनाने की जरूरत है।

विगत वर्षों के डाटा को देखा जाए तो महिलाओं के पास फोन या लैपटॉप उपलब्ध होने का जो अनुपात है वह पुरुषों के अनुपात का आधा भी नहीं है। इन्टरनेट तो हम तब पहुंचाएंगे जब उनके पास इंटरनेट कनेक्शन के लिए या डिजिटली अवेयर होने के सबसे न्यूनतम साधन के रुप में फोन भी उपलब्ध करवा पाएंगे। क्योंकि वह सिर्फ़ भाई, पापा, या पति के पास ही होगा और आप उसी मे अपनी डिजीटल दुनिया खोज ले यही बेहतर है । अगर कहीं फोन या लैपटाप मिल भी जाए तो इसकी हिस्ट्री और पासवर्ड घर में किसी बड़े (अब तो छोटो के पास भी) होना चाहिए ताकि लड़की कंट्रोल में रहे। डिजिटल इंडिया बनने के रास्ते में कुछ दूर का सफर तय कर चुके हैं पर डिजीटल के साथ साथ सोशल और पर्सनल लेवल पर भी सोसायटी को अवेयर कर पाए की आधी आबादी की हिस्सेदारी भी आज के डिजिटल दुनिया में उतनी ही ज़रूरी हैं जितनी और सबकी ।