Monday, October 25, 2021

मासुम हंसी

जब भी इन मुस्कुराते चेहरों को देखती न, अपनी चहतो में से एक चाहत को कम कर देती हूं....
असान  नही था मेरेे लिए उनसे मिलना , उनसे बातें करनाा, उनकी परेशानियों को जानना जिसेे हमारा समाज  अपने से किनारा करता हैै  । 

जब भी कॉलेज से घर जाती तो फ्लाईओवर के नीचे झोपड़पट्टीओं में रह रहे कुछ लोगों को देखती, कुछ महिलाएं वही रोड के किनारे लकड़ियों से खाना बनाती,  कुछ छोटे-छोटे मासूम बच्चे बिखरे बाल ,बिना चप्पल पैर धूप से तपती  उस रोड पर खेलते दौड़ते।

उन बच्चों की हंसी बेहिसाब होती थी, सारी दुनिया जहां से बेखबर यह बच्चे अपनी छोटी-छोटी खुशियों में ही सारे जहां की खुशी ढूंढ लेते।
जब भी उन मासूम चेहरे की मासूम हंसी को देखती हूं ना, अपनी चाहतों में से एक चाहत को कम कर देती हूं।
हर बार मन होता था जाकर उन हंसते चेहरों के साथ सेल्फी लू, उन औरतों से बातें करू कि वह यहां खुले में खाना क्यों बनाती हैं, इन झोपड़पट्टीओ में वह बरसात के दिनों में भी गुजारा कैसे कर लेती है बहुत कुछ जानना था मुझे ,जिसे मैं  नहीं जानती थी।

इनकी कहानियां ना तो नानी दादी की कहानियों में होती थी ,और ना ही स्कूल की किताबों में।
पर कहानियां तो है इनकी, तभी तो समाज के रीति-रिवाजों से अलग किया गया है इनको।
मुझे जाननी थी इनकी कहानियां , पर हिम्मत नहीं होती थी इनके  करीब जाकर इनसे बातें करने की ।जब कभी इनके तरफ अपना कदम बढ़ाती याद आ जाता था मुझे बचपन का वो घटना जब इनके जैसे बच्चो के साथ खेलते देखे जाने पर कैसे नहलाया गया था मुझे।
उस छोटे से दिमाग ही इनके प्रति कितनी भेदभाव की भावना डाली गई थी।
लेकिन आज मैं वह छोटी बच्ची नहीं रही मुझे सही और गलत में फर्क का समझ है, ।
आखिरकार आज मैंने अपनी मन की सूनी अपनी एक दोस्त के साथ मिलकर इनको  और जानने की रणनीति तैयार की।

आज कॉलेज खत्म होने के बाद मैं और मेरी दोस्त वहां गए । मेरी दोस्त जो कि पहली बार इनको देख रही थी वह बस अपनी आंखें खोले चारों तरफ देखी ही जा रही थी,  थोड़ी देर तक उन्हें ऐसे ही निहारने के बाद हमने वहां की महिलाओं से बात करने की सोची... लेकिन शुरू कैसे करें कही हमारा उनसे बात करना हमको अच्छा ना लगे...क्या वो हमारे साथ बात सहज रहेंगे।

काफी सोच-विचार के बाद आखिरकार मैंने बात शुरू कर ही दी , वहां खड़ी एक महिला से मैं पूछी "आप क्या काम करती हैं"
"जी हम कोई काम नहीं करते,  हमारे आदमी काम करते हैं ,हम तो बस घर का काम करते हैं..."
उस महिला ने शांत स्वभाव से कहा, मुझे लगा यह हमारे साथ सहज है तो मैंने तुरंत बात आगे बढ़ाई, मैंने उनसे पूछ लिया "आपका यही घर है ?"....मैंने झोपड़पट्टीओ की तरफ इशारा करते हुए कहा...।
"जी दीदी" उस महिला ने जवाब में मुझसे कहा।

वहां कुछ और महिलाएं और बच्चे इकट्ठा हो गए, हमने उन्हें अपने बारे में बताया.. और वहां मौजूद सबसे उनसे जुड़ी व्यवस्थाओं के बारे में पूछने लगे ...।पहले हम इनके बारे में जो कुछ भी सोचते थे वह गलत साबित हो रहे थे हमें लगा था यह हमसे बात नहीं करेंगे हम से डरेंगे लेकिन ऐसा कुछ नहीं था , जबकि वो लोग सकारात्मक उम्मीद के साथ अपनी बातें अपनी परेशानियां हमें बता रहे थे ।
किसी ने सच ही कहा है , इंसान का दिल बड़ा होना चाहिए घर नहीं।
और सच,.... में इनका घर नहीं था, खाने को उपयुक्त भोजन नहीं थे , लेकिन इनके वह बांस और कपड़ों के मंदिर में कोई आए यह उनका पूरा सम्मान करते हैं।
जब उनको पता चला कि हम उनकी परेशानियों को जानने आए हैं,  यह लोग हमारे बैठने के लिए अपने आशियाने से कुर्सी लेकर आने लगे।
अब तक वहां पर कुछ पुरुष ही आ गए थे, उनसे बात करके हमें पता चला यह सारे पुरुष नगरपालिका में साफ सफाई का काम करते हैं ।अपनी जीविका के लिए उनका बस यही एक स्रोत है।
सरकारी सुविधाओं के बारे में जब हमने उनसे पूछा तो उनका कहना था , आधार कार्ड है लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनका अब तक नहीं बन पाया है ....राशन के नाम पर सबको 1 kg चावल मिलता है ...इनको मनरेगा और कॉलोनी जैसी सरकारी  सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पाता है क्योंकि इनका जमीन नहीं है।
हम इनसे बात ही कर रहे थे कि वहां मौजूद उन मासूम बच्चों ने  हमारा ध्यान अपनी तरफ आकर्षित कर लिया।

हमें देखकर वह बच्चे हैरान नहीं बल्कि मुस्कुरा रहे थे शायद उन्हें भी हमसे किसी चीज क उम्मीद थी। उन बच्चों की मासूम सी हंसी मुझे उनकी तरफ खींच ली...
मैं एक बच्चे के सर पर हाथ फेरते हुए पूछी "बाबू स्कूल जाते हो?"
उन बच्चों ने बड़ी ही मासूमी से अपना सर ना में हिलाया,  ।
उन्हें देखकर तरह तरह के ख्याल आने लगे मन में ... लेकिन मैंने अपना सिर झटका और मुस्कुराते हुए उनसे पूछी" मन करता है स्कूल जाने का!" 
वह बच्चे अपनी आंखें टिमटिमाते हुए हां में सर हिलाए।
वहां के लोगों ने बताया कि सरकारी स्कूल रेलवे ट्रैक के उस पार है.... जिससे बच्चों को स्कूल जाने में खतरों का सामना करना पड़ता है ....हमारे कई बच्चों का वहां दुर्घटना से मौत हो चुका है ...जिससे अब  हम इन्हें स्कूल  नहीं भेजते। 
शाम होने लगी थी, अब मुझे घर जाना था,  जानने इनको गई थी लेकिन मेरी गुत्थी सुलझाने की जगह और उलझ गई इन बच्चों के मासूम हंसी को देखकर। इनके लिए कुछ तो करना है मुझे, कुछ ऐसा कि भविष्य में परेशानियों का कोई ट्रैक इनके शिक्षा को ना रोक पाए।

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