Wednesday, February 19, 2025

राजनीतिक खींचतान: डॉ. अंबेडकर की विरासत और कांग्रेस-बीजेपी की दोहरी नीति

कांग्रेस और बीजेपी, दोनों ही डॉ. अंबेडकर को अपनाने की होड़ में लगी हैं, लेकिन उनके तरीके यह दिखाते हैं कि वे वास्तव में उनके सिद्धांतों के प्रति कोई ईमानदार नहीं हैं।
आधुनिक भारतीय राजनीति में डॉ. बी.आर. अंबेडकर की विरासत को लेकर वैचारिक टकराव काफी बढ़ गया है। हाल ही में गृह मंत्री अमित शाह के संसद में दिए गए बयान के बाद यह बहस और तेज हो गई। कांग्रेस ने बीजेपी पर "अंबेडकर विरोधी" और "संविधान विरोधी" होने का आरोप लगाया, जबकि बीजेपी ने पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस ने इतिहास में कई बार डॉ. अंबेडकर और उनके मिशन को नजरअंदाज किया है।  

असल में, दोनों दल डॉ. अंबेडकर की विरासत को अपने पक्ष में करने की कोशिश में लगे हैं, लेकिन उनके संघर्षों और उनकी जाति के लोगों को मिलने वाली उपेक्षा को नजरअंदाज कर रहे हैं। कांग्रेस ने पहले और बीजेपी अब तक, किसी ने भी सच्चे मन से डॉ. अंबेडकर के विचारों को पूरी तरह लागू नहीं किया और न ही दलित समुदाय के हितों की सही मायने में रक्षा की।

जब कांग्रेस द्वारा डॉ. अंबेडकर से किया गया विश्वासघात:
भारतीय संविधान के निर्माता डॉ. बी.आर. अंबेडकर का कांग्रेस के साथ रिश्ता हमेशा विवादास्पद रहा। आज उनकी सराहना की जाती है, लेकिन उनके राजनीतिक जीवन में कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें हाशिए पर रखा।  

1952 के मुंबई लोकसभा चुनाव इसका बड़ा उदाहरण है। अंबेडकर एक राष्ट्रीय नेता थे और वंचित समुदायों के अधिकारों के लिए लड़ रहे थे, लेकिन कांग्रेस ने उनका समर्थन नहीं किया, जिससे उन्हें हार का सामना करना पड़ा।  

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि कांग्रेस को अंबेडकर की सामाजिक न्याय की सोच से खतरा महसूस हुआ, क्योंकि यह विचार भारतीय समाज में गहराई से जमी हुई जाति व्यवस्था को चुनौती देता था।  

यह उपेक्षा सिर्फ एक बार नहीं हुई। 1954 के भंडारा उपचुनाव में भी कांग्रेस ने अंबेडकर का विरोध किया। कांग्रेस ने न तो उनके योगदान को ठीक से स्वीकार किया और न ही उन्हें कोई राजनीतिक अवसर दिया। यह दिखाता है कि अंबेडकर की विचारधारा को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया। उनकी हार सिर्फ उनकी व्यक्तिगत हार नहीं थी, बल्कि दलितों के सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय की लड़ाई के लिए एक बड़ा झटका थी।  

यह इतिहास एक गंभीर सवाल खड़ा करता है—क्या कांग्रेस वास्तव में अंबेडकर की विरासत के प्रति ईमानदार है? यह विडंबना है कि जो पार्टी अंबेडकर के जीवनकाल में उनके साथ नहीं खड़ी हुई, वह आज उनके सिद्धांतों की रक्षा का दावा कर रही है।

बीजेपी द्वारा अंबेडकर को अपनाने की कोशिश:
दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) हाल के वर्षों में अंबेडकर की विरासत को अपने पक्ष में दिखाने के लिए सक्रिय रही है। पार्टी अक्सर अंबेडकर के नाम पर स्मारक बनाने और अंबेडकर जयंती को भव्य रूप से मनाने पर जोर देती है। लेकिन ये प्रतीकात्मक कदम बीजेपी शासन में दलितों की वास्तविक स्थिति से बिल्कुल अलग हैं।  

बीजेपी के अंदर वैचारिक टकराव उसकी संघ परिवार से जुड़ी विचारधारा के कारण पैदा होता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) जैसी संस्थाओं की परंपरागत सोच अंबेडकर की जातिवाद विरोधी नीतियों से मेल नहीं खाती। अंबेडकर ने हिंदू रूढ़िवाद की खुलकर आलोचना की थी और जाति उत्पीड़न से मुक्ति पाने के लिए बौद्ध धर्म को अपनाया था। लेकिन बीजेपी सरकार की नीतियां जातिगत हिंसा, दलितों के खिलाफ बढ़ते अत्याचार और बहुसंख्यकवादी राजनीति पर चुप्पी साधे रहती हैं, जिससे यह साफ होता है कि पार्टी अंबेडकर के विचारों को अपने तरीके से तोड़-मरोड़ कर देखती है।  

गृह मंत्री अमित शाह के हालिया बयान ने इस विरोधाभास को और गहरा कर दिया है। बीजेपी कांग्रेस पर अंबेडकर की अनदेखी का आरोप तो लगाती है, लेकिन खुद उसकी नीतियां वंचित समुदायों के लिए कोई बड़ा फायदा नहीं पहुंचातीं। उदाहरण के लिए, दलित समुदाय आज भी भेदभाव, आर्थिक पिछड़ेपन और सरकारी संस्थानों में कम प्रतिनिधित्व जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, जबकि बीजेपी समावेशी राजनीति का दावा करती है।

कांग्रेस और बीजेपी: एक ही सिक्के के दो पहलू:
कांग्रेस और बीजेपी, दोनों ही अंबेडकर को अपनाने की होड़ में लगी हुई हैं, लेकिन उनके तरीके यह दिखाते हैं कि वे वास्तव में उनके सिद्धांतों के प्रति ईमानदार नहीं हैं।  

कांग्रेस, जो खुद को धर्मनिरपेक्ष और समावेशी बताती है, ने अंबेडकर की जाति प्रथा खत्म करने की मांग को हमेशा नजरअंदाज किया। दशकों तक सत्ता में रहने के बावजूद, वह जातिगत भेदभाव और असमानता को खत्म करने में नाकाम रही, जिससे आज उसका अंबेडकर की विरासत पर दावा कमजोर नजर आता है।  
इसी तरह, बीजेपी भी अंबेडकर को सम्मान देने का दिखावा तो करती है, लेकिन उसकी विचारधारा और राजनीतिक लक्ष्य अंबेडकर के सिद्धांतों से मेल नहीं खाते। अंबेडकर की समानता, जाति उन्मूलन और सामाजिक न्याय की सोच, बीजेपी की सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की नीतियों के खिलाफ जाती है।  

जिस दलित समुदाय के लिए अंबेडकर ने जीवनभर संघर्ष किया, वह आज भी उपेक्षित है। राजनीतिक दल अंबेडकर के नाम का इस्तेमाल केवल वोट हासिल करने के लिए करते हैं, लेकिन उनकी विचारधारा को हकीकत में बदलने के लिए ठोस नीतियां लागू नहीं करते।

डॉ. अंबेडकर की विचारधारा: 
डॉ. अंबेडकर का प्रभाव केवल संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका तक सीमित नहीं था। वे दूरदर्शी नेता थे, जिन्होंने समझा कि अगर सामाजिक और आर्थिक समानता नहीं होगी, तो राजनीतिक लोकतंत्र अधूरा रह जाएगा। उन्होंने शिक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण और जाति प्रथा के उन्मूलन को एक समान समाज के लिए अनिवार्य बताया।  

लेकिन, किसी भी सरकार ने इन बुनियादी समस्याओं को पूरी तरह हल नहीं किया। आज भी दलितों को शिक्षा और नौकरी के क्षेत्र में सीमित अवसर मिलते हैं, और जातिगत भेदभाव अलग-अलग रूपों में जारी है। डॉ. अंबेडकर द्वारा शुरू किया गया आरक्षण तंत्र, जिसका उद्देश्य दलितों को प्रतिनिधित्व और सशक्तिकरण देना था, अक्सर कमजोर किया गया या राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया गया।  

डॉ. अंबेडकर की विरासत का सही सम्मान:
कांग्रेस और बीजेपी के बीच चल रही बहस यह दिखाती है कि दोनों दल अंबेडकर की विरासत को केवल राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। दलितों की वास्तविक समस्याओं पर ठोस नीतियों पर चर्चा करने के बजाय, दोनों दल केवल इतिहास पर एक-दूसरे को दोष देने में लगे रहते हैं।  

अंबेडकर के सपनों को साकार करने के लिए सिर्फ बातें नहीं, बल्कि ठोस कदम उठाने की जरूरत है। शिक्षा, भूमि सुधार, रोजगार के अवसर बढ़ाना और जातिगत हिंसा के खिलाफ कड़े कानून बनाना प्राथमिकता होनी चाहिए। अंबेडकर मानते थे कि असली सशक्तिकरण तभी होगा जब जाति प्रथा खत्म होगी और आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल होगी।  

साथ ही, राजनीतिक दलों को अंबेडकर के संपूर्ण योगदान को पहचानना चाहिए। उनके संघर्षों, विचारों और बलिदानों को केवल चुनावी लाभ के लिए सीमित नहीं किया जा सकता। कांग्रेस और बीजेपी, दोनों को यह सोचना चाहिए कि उन्होंने जातिगत असमानता को बनाए रखने में क्या भूमिका निभाई है और अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए।




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