Friday, February 14, 2025

Ghar ke kaamo me brabr ki hissedari: तुम घर पर करती ही क्या हो... और कब तक!


Story of house wife:घरेलू महिलाओं के संघर्ष और समाज के दोहरे रवैया को दर्शाती फिल्म मिसेज, आखिर कब मिलेगा महिलाओं को उनका हक़।
हाल ही में आरती कादव की निर्देशन में आई फिल्म मिसेज , समाज के हर उस महिला की कहानी बयां करती है जो शादी के बाद अपनी पूरी जिंदगी पति और परिवार के देखभाल में गुजार देती हैं। लेकिन फिर भी उनके कामों को इस समाज में कोई सम्मान नहीं मिलता। आखिर कब तक हमारा समाज महिलाओं और उनके घरेलू कामकाज के साथ दोहरा व्यवहार करता रहेगा?

अगर मैं इस फिल्म की कहानी संक्षिप्त में बताऊं तो फिल्म में मुख्य किरदार ऋचा  को एक अरेंज मैरिज सेटअप के बाद शादी, रिश्तों और सामाजिक अपेक्षाओं से संघर्ष करते दिखाया गया है। फिल्म की शुरुआत में दिखाया जाता है कि ऋचा एक बहुत अच्छी डांसर होती है और वह आगे डांस में ही अपना कैरियर बनाना चाहती है लेकिन शादी के बाद उसकी जिंदगी किचन से शुरू होकर किचन तक ही सिमट कर रह जाती है। 

हालांकि यह कहानी सिर्फ ऋचा की हि नहीं बल्कि हर उस लड़की की कहानी है जिसके सपने और इच्छाएं शादी और घरेलू कामकाज तले दब जाते है। फिर भी उन्हें हमेशा यह सुनने को मिलता है कि आखिर तुम करती ही क्या हो?, हमारा समाज एक महिला और उसके काम को हमेशा दोयम दर्जे पर देखा है, और यह कोई आज या कल की बात नहीं बल्कि सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही एक प्रथा सी बन गई है। अभी के समय में घर परिवारों में बहुत कुछ बदला है, परंतु आज भी अगर कुछ नहीं बदला तो घरेलू कामकाजी महिलाओं के लिए यह शब्द कि तुम्हें काम ही क्या है?

एक स्टडी के अनुसार अगर एक घरेलू कामकाजी महिला के काम का सही से आकलन किया जाए तो शहरी महिला औसतन साढ़े पांच से छह घंटे काम करती है, तो वही गांव में रहने वाली महिला औसतन दिन में पांच से साढ़े पांच घंटे घर में काम करती है। सिर्फ यही नहीं नौकरियों में लगी महिलाओं को भी ऑफिस या अन्य प्रकार के कार्य स्थल के अलावे घर के कामों का दोहरा बोझ होता है। 

जबकि पुरुषों के साथ ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। एक पुरुष के दिन की शुरुआत सुबह ऑफिस जाने से लेकर शाम को घर वापस आने तक होता है और ज्यादा से ज्यादा कुछ उनका व्यक्तिगत काम, लेकिन इसमें भी 40% उनका काम महिलाएं ही करती हैं, जैसे यह सामान कहां है, वह कहां है, मेरा सामान मिल नहीं रहा ढूंढ दो, यह करो, वह करो, उसको बुलाओ, वगैरह वगैरह। 

जबकि एक महिला सुबह उठने से लेकर रात सोने तक अनगिनत मुश्किल काम करती हैं और कोई पुरुष इनका मदद भी नहीं करते। हालांकि कुछ मामलों में अगर मदद कर भी दिए तो ज्यादातर औरतों को यह सुनने मिलता है कि देखो तुम्हारा काम था मैंने कर दिया, मतलब वह उन पर एहसान जताने लगते हैं जबकि यह बराबरी का काम हो सकता है।

अगर घर संभालने को दुनिया का सबसे मुश्किल काम कहा जाए तो शायद यह गलत नहीं होगा। क्योंकि यह एक ऐसा पेशा है जहां सप्ताह के सातों दिन बिना किसी छुट्टी के 24 घंटे काम करने होते हैं। सोचिए कितना आसान होता है उस महिला को यह कहना कि तुम पूरा दिन घर पर करती ही क्या हो, जो सातों दिन 24 घंटे काम करती है वो भी बिना किसी मेहनताना के, जाहिर सी बात है इतना काम अगर किसी नौकर चाकर से करायी जाए तो उसे एक बड़ी राशी जरूर चुकानी पड़ती।

करीब 17 साल पहले की एक घटना है, जिसमें एक महिला के दुर्घटना में हुई मौत पर बीमा कंपनी ने महिला के हाउसवाइफ होने के आधार पर उसकी जिंदगी की कीमत बहुत कम आंकी थी, और फिर यह मामला कोर्ट तक पहुंच गया। इस पर अपने जजमेंट में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घरेलू काम करने वाली महिलाओं के काम का महत्व किसी भी तरह से उनके पति के काम से काम नहीं है। कोर्ट का जजमेंट यह भी था कि होम मेकर्स द्वारा किए गए काम को ध्यान में रखते हुए उनके लिए एक अनुमानित आय का आकलन होना चाहिए।

साल 2004 में एक हाई कोर्ट भी यह कह चुका है कि हाउसवाइफ की कम से कम वैल्यू रुपयों में मासिक आय सुनिश्चित होना चाहिए। केरल में भी हाउसवाइफ के लिए मासिक भत्ते की मांग सामने आ चुकी है, ऐसे ही कई और राज्य सरकारे होम मेकर्स को आर्थिक मदद देने के लिए अलग-अलग योजना लाने की बात करती आई है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ उनके श्रम को आर्थिक मूल्य दे देने से हम उनको वह समुचित सम्मान दे पाएंगे जिसकी वह हकदार है। यहां जरूरत सिर्फ घर के कामों की कीमत तय करने की नहीं, बल्कि उस महिला के सम्मान को मान्यता देने की है, जो किसी भी महिला को दिया जाने वाला सबसे बड़ा धन है।
आज जरूरत है घर के कामों में बराबर की हिस्सेदारी की। हमारे समाज को यह समझना होगा कि काम का कोई लिंग नहीं होता।

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